2 साम्राज्यवाद बनाम संघवाद - Page 113

98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

संघीय सरकार उतनी कार्यकुशल हो सकती है जितनी एक साम्राज्यवादी सरकार? क्या इसकी विश्वसनीयता उतनी ज्यादा हो सकती है? क्या इसका आत्मसम्मान साम्राज्यवादी सरकार के बराबर हो सकता है, यह कहना आवश्यक है कि लोगों के दिमाग में यह बात अभी भी थी कि नियंत्रण की भारी शक्ति से लैस साम्राज्यवादी व्यवस्था ने ही ब्रिटिशवासियों के लिए इस देश को 1857 के सैनिक विद्रोहियों के हाथों से बचाया था। संघर्ष में साम्राज्यवादी व्यवस्था के बचे रहने की कीमत सिद्ध हो चुकी थी। चातुर्यपूर्ण कदम उठा कर साम्राज्यवादियों ने शासकों के संघर्ष के दौरान साम्राज्यवादी व्यवस्था के बचे रहने के कारणों पर विचार करने के लिए कहा। वे इस बात पर जोर देते रहे कि चूंकि वित्त को साम्राज्यवादी व्यवस्था ने समाजवादी सरकार के हाथों में राजस्व के प्रबंधन और आबंटन पर नियंत्रण का अधिकार दे दिया था, अतः सैनिक विद्रोह जैसी आपातकालीन स्थिति में साम्राज्य आय के प्रत्येक स्रोत का इस्तेमाल कर सका, खर्चे के प्रत्येक रास्ते बंद कर सका और अपने समस्त खर्चो को दाव पर लगे एकमात्र उद्देश्य ख्....., विद्रोह को कुचलने ख्....., पर केन्द्रित कर सका। उन्होंने यह दर्शाया कि साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था के अभाव में साम्राज्यवादी सरकार को उदासीन और अंसतुष्ट तथा उद्दंड सहयोगियों का सामना करना पड़ता, जो संभवतः संघर्ष से सीधे नहीं जुड़े थे और संघर्ष की जरूरत पर कम विश्वास रखते थे। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि वित्त साम्राज्यवादी प्रबंधन न केवल सरकार की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए जरूरी था बल्कि विश्वसनीयता बरकरार रखने के लिए भी आवश्यक था। यह तर्क दिया गया कि विश्वसनीयता राजस्व की मात्रा पर निर्भर करती है, और राजस्व का विघटन विश्वसनीयता का प्रश्न चिह्न लगा देता है। संघीय सरकार पर यह भी आरोप लगाया गया कि उसने इस यूरोपीय परंपरा को भी आघात पहुंचाया जिसके तहत यूरोप ने एशिया की सरकारों के लिए सम्मान को काफी ऊंचा दर्जा दिया। साम्राज्यवादियों के लिए यह सोचना असंभव था कि केन्द्र सरकार वित्त के केन्द्रीयकरण के बिना भी हैसियत बनाए रख सकती है क्योंकि यह साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था की ही देन थी कि साम्राज्यवादी सरकार के हाथों में राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में मुख्य तंतु प्रदान कर उस सरकार के लिए नीति निर्धारण करना और उसका संतोषजनक क्रियान्वयन कराना संभव बनाया था। लेकिन यदि केन्द्रीय सरकार स्थानीय सरकारों की पिछलग्गू बन जाती है तो इसके सम्मान की रक्षा कौन करेगा?

विवाद की अग्र भूमि से देखा जाए तो पता चलता है कि औचित्य रहित तर्क में ऐसी क्या शक्ति थी जिससे साम्राज्यवादियों ने संघीय व्यवस्था के पक्षधरों पर विजय प्राप्त की। अमरीका, जर्मनी या अन्यत्र संघीय सरकारें इस तर्क का समर्थन नहीं करती थीं कि उनके कार्य में कार्यकुशलता, साख या आत्मसम्मान को हानि पहुंचती है। किन्तु यह स्मरणीय है कि जब भारत में यह विवाद उत्पन्न हुआ तब संघीय व्यवस्था का इतिहास अपने शैशवकाल में था। लोग साम्राज्यवादियों के