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साम्राज्यवाद बनाम संघवाद 99

पक्षधर इसलिए नहीं थे कि वे संघीय व्यवस्था के इतिहास के पक्ष में नहीं थे बल्कि इसलिए कि समय ने उनको साम्राज्यवादी व्यवस्था का समर्थन करने के लिए बाध्य किया था। साम्राज्यवादी व्यवस्था ने भारत को 1857 के सैनिक विद्रोह से बचाया था, और ऐसे में जबकि सैनिक विद्रोह के दोबारा घटित होने संबंधी उनकी आशंकाएं दूर नहीं हुई थीं, उनसे यह उम्मीद रखना बेकार था कि वे उस व्यवस्था को बिगाड़ने की सहमति देंगे जिसने संकट में उनकी रक्षा की थी। हालांकि लोग उस व्यवस्था की बुराइयों से अवगत थे लेकिन वे उसके साथ छेड़-छाड़ करने को राजी नहीं थे। साम्राज्यवादी व्यवस्था के प्रति लोगों का सुझाव इस कदर था कि यह जानते हुए भी कि व्यवस्था की बुराइयां उसकी कार्य कुशलता पर हावी हो रही हैं वे माननीय मेजर जनरल सर एच.एम. ड्यूरेंड की निम्नलिखित पंक्तियों को सहानुभूतिपूर्वक सुनते थेःµ

‘‘....मैं विश्वासपूर्वक कहता हूं कि फिलहाल इस आरोप में कोई दम नहीं है कि वित्तीय नियंत्रण के मामले में भारत सरकार अपने प्रयासों की सीमा से बाहर चली जाती है, और बुरी तरह विफल रहती है....इसके विपरीत नियंत्रण की छोटी सी विफलता....इस बात का प्रमाण नहीं है कि नियम में खामियां हैं बल्कि यह साबित होता है कि नियंत्रण में किसी भी तरह की ढील अनुचित है। साथ ही यह इस बात का भी प्रमाण है कि भारत सरकार और गृह सरकार दोनों को ही नियमों का कड़ाई से पालन करवाना चाहिए। केवल इसलिए केन्द्र सरकार के वित्तीय नियंत्रण को कम कर दिया जाए क्योंकि नौ प्रशासनिक इकाइयों में से एक इकाई अनियंत्रित हो चुकी है, यह तर्क मुझे वैसा ही लगता है जैसा कि सेना की एक रेजिमेंट के दुर्व्यवहार के कारण युद्ध के निर्देशों को और प्रधान सेनापति की शक्तियों को ही गैर-कानूनी कर दे डालना। मैं भारत अथवा सेनाओं को इस तरह शासित किए जाने के राजनीतिक दृष्टिकोण को शंका की नजर से देखने का दुस्साहस करता हूं।’’

साम्राज्यवादियों की जीत के बावजूद यह कहा जा सकता है कि संघीय व्यवस्था के हिमायती जिस मुद्दे पर हार गए उसे जीता जा सकता था। क्योंकि भले ही उस समय लोगों की भावनाएं साम्राज्यवादी व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में रही हों, बदलते घटनाचक्र को रोक पाने की ताकत उनमें नहीं थी। साम्राज्यवादी सरकार को हर हाल में निर्धनता की स्थिति में उबारना था, और इससे निबटने के लिए यदि राजनीतिक चिंतन ने संघीय वित्त व्यवस्था का साधन के रूप में पक्ष नहीं लिया होता तो पूंजीपतियों को यह बात समझ में आ गई होती कि साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था उद्देश्य की दृष्टि से कारगर नहीं है।

  1. 7 अक्तूबर 1867 को लिखे गए अंश का हिस्सा, पृ. 94-7।