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समझौता
साम्राज्यवादी प्रबंध रहित साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था
हालांकि संघीय व्यवस्था के हिमायती जीत हासिल नहीं कर सके लेकिन उन्होंने अपने विरोधियों को विद्यमान व्यवस्था के दोषों को दूर करने के लिए बाध्य कर दिया। अब मुख्य रूप से इस बात पर ध्यान दिया जाने लगा कि राजस्व संबंधी कानूनों को बदला जाए और राजस्व उगाहने वाले तंत्र को अधिक चुस्त दुरुस्त बनाया जाए ताकि आमदनी में बढ़ोतरी हो और फिजूलखर्च में कटौती। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अंतिम दिनों में साम्राज्यवादी व्यवस्था को मजबूत और खुशहाल बनाने के उद्देश्य से उन करों को हटा लिया गया और देश को उन सभी नियंत्रणों से मुक्त कर दिया गया जो व्यापार और उद्योग के विकास में बाधा कर रहे थे। साथ ही औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिहाज से आयात शुल्क के रूप में उन्हें सुरक्षा दिए जाने की कोशिश की गई और व्यापार को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए ब्रिटिश तथा विदेशी जहाजों पर लगने वाले शुल्क को एक समान कर दिया गया। निर्यात करने वाली वस्तुओं पर से निर्यात शुल्क हटा लिया गया और कपास तथा चाय जैसी वस्तुओं की यूरोप व अन्य देशों के बाजारों में मांग को देखते हुए इन वस्तुओं के उत्पादन को बढ़ाने के प्रयास किए जाने लगे।
इसके पश्चात् प्रशासनिक तंत्र में बदलाव लाया गया। इस दिशा में इंडियन काउंसिल्स एक्ट, 1861 का फायदा उठाया गया। इस कानून के तहत वायसराय को यह अधिकार दिए गए थे कि वह अपनी परिषद् के कामकाज को अधिक सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से समय-समय पर नए नियम एवं आदेश निकाल सकता है, कानूनी तौर पर उस व्यवस्था को समाप्त कर सकता है जिसके तहत सरकारी कामकाज के निर्वहन में परिषद् के प्रत्येक सदस्य को प्रशासन के अलग-अलग विभाग का जिम्मा सौंप कर पूरी परिषद् सामूहिक रूप से भाग लेगी। इस प्रकार