3 समझौता - साम्राज्यवादी प्रबंध रहित साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था - Page 117

102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लैंग के स्थान पर आए श्री मैसी को ‘‘साम्राजय की वित्तीय स्थिति का जायजा लेने पर तथा साम्राज्य के वित्तीय स्रोतों पर बढ़ते दबाव के कारण राजस्व के वर्तमान स्तर में 10 लाख पौंड स्टर्लिंग की धन राशि जुटाने का स्थाई प्रावधान करना पड़ा।’’ ख्1,

सभी वित्त मंत्रियों के प्रयास असफल रहने के क्या कारण थे? इन प्रयासों की असफलता का कारण देश की प्रशासनिक और बाहरी जरूरतों में हुई भयंकर वृद्धि में ढूंढा जा सकता है।

सैनिक विद्रोह के पश्चात् ‘‘हजारों की तादाद में न केवल अंग्रेज सिपाही बल्कि सभी तबकों के ब्रिटेन निवासी भारत आ धमके। लिहाजा हजारों ऐसी चीजों की मांग होने लगी जो भारत में नहीं थीं लेकिन जिन्हें उपलब्ध कराना जरूरी हो गया था। देश में रेल, तार, सड़कें और पुलों का जाल बिछाया जाना था। लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए नहरों का निर्माण करना था, यूरोप की सेना के लिए बैरक बनवाने थे और सेना के फायदे के लिए हर प्रकार की जन सुविधा संबंधी सुविधाएं प्रदान करनी थीं। यह केवल साम्राज्यवादी सरोकारों के बारे में ही सत्य नहीं था। सुविध ाओं की बेहतरी की मांग का दबाव केन्द्र सरकार के तहत आने वाले प्रत्येक कस्बों और जिलों में भी बढ़ रहा था। कार्यकुशल प्रशासन की भी मांग बढ़ रही थी। पूरे भारत में पुलिस प्रशासन बहुत दयनीय स्थिति में था। कचहरियों में महत्त्वपूर्ण पदों पर तैनात देशी न्यायाधीशों तथा न्यायालय के अन्य अधिकारियों को मिलने वाले कम वेतन संबंधी अपने वायसराय होने के दौरान लार्ड लारेंस की घोषणा जनता के साथ धोखा था। बंगाल प्रेसीडेंसी में 4000 से अधिक न्यायिक अधिकारियों में से मात्र कुछ अधिकारियों को ही सबसे अधिक 180 पौंड सालाना वेतन मिला करता था। अधिकांश अधिकारियों को 12 से 24 पौंड सालाना वेतन मिलता था। यह राशि देश के अन्य हिस्सों में कार्यरत मजदूरों और बढ़इयों को मिलने वाले भुगतान से भी कम थी। इस असमानता को दूर करना जरूरी था।’’ ख्2,

जबकि अधिक खर्च करने की जरूरत बढ़ती जा रही थी, खर्चे में कटौती करना मुश्किल होता जा रहा था। हालांकि शुरुआत में यह आसान लग रहा था लेकिन बाद में खर्च में कटौती के लिए उठाया जाने वाला प्रत्येक कदम अधिक कठिन साबित होने लगा। स्थिति में सुधार लाने की बढ़ती जरूरत और खर्चों में कटौती करने की खत्म होती गुंजाइश ने सरकार को नए-नए कर लगाने पर मजबूर कर दिया। एक विदेशी सरकार द्वारा करों को लगाए जाने का खतरा उन तीनों वित्त

  1. 21 फरवरी, 1866 को स्थानीय सरकार को दिए गए सर्कुलर।

  2. उपरोक्त अंश पर जान स्ट्रेची की पुस्तक आब्जर्वेशन ऑफ सम क्वेश्चंस ऑफ इंडियन फाइनेंस से लिए

गए हैं। हाउस ऑफ कामन्स रिटर्न, 326, सन् 1874