3 समझौता - साम्राज्यवादी प्रबंध रहित साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था - Page 118

समझौता 103

शास्त्रियों के दिमाग में था जो बारी-बारी इंग्लैंड से भारत की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भेजे गए थे। वे जानते थे कि स्थानीय जनता करों की शर्त पर जीवन की सुविधाओं का भोग करने के लिए राजी नहीं थी। उन्होंने यह महसूस किया कि यदि स्थानीय जनसंख्या की तुलना में यूरोप निवासियों को फायदा पहुंचाने के लिए की जा रही प्रशासनिक, आर्थिक व नैतिक मांगों पर रोक नहीं लगाई गई तो कितना भी कर क्यों नहीं लगा दिया जाए, वह आर्थिक स्थिति सुधारने में अक्षम ही रहेगा। साथ ही साम्राज्य की राजनीतिक स्थिरता के लिए भी खतरा पैदा हो सकता है। निरर्थक समानता और पांडित्य प्रदर्शक केन्द्रीकरण की वर्तमान व्यवस्था के तहत उनका उद्देश्य पूरा हो पाना मुश्किल था। क्योंकि खर्चों में कटौती के लिए केन्द्र सरकार स्थानीय सरकारों पर निर्भर थी और स्थानीय सरकारें वित्तीय सतर्कता तथा वित्तीय सुधार के मामलों में केन्द्र सरकार के प्रति न केवल ढीला रुख अपनाएं थीं बल्कि अक्सर निष्क्रिय विरोध का प्रदर्शन भी करती थीं और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए बनाए गए नियमों का पालन भी नहीं करती थीं। स्थानीय सरकारों को अपने खर्चों में कटौती करने के लिए राजी करने का एक ही रास्ता थाµ उन्हें राज-काज चलाने के लिए अधिक अधि कार और जिम्मेदारी सौंपी जाए। अपने प्रशासनिक अनुभव के दौरान वित्त शास्त्रियों को यह जानकारी मिली थी कि जबकि राजस्व और खर्च संबंधी कुछ विभाग केन्द्र सरकार के हिस्से में आते थे, वहीं बहुत से विभाग ऐसे भी थे जो स्थानीय चरित्र के थे और सरकारों के जिम्मे आने चाहिए थे। वे पूरी तरह आश्वस्त थे कि खर्चों में कटौती तब तक नहीं हो सकती जब तक स्थानीय सरकार की जरूरतों को निश्चित स्रोतों पर निर्भर नहीं कर दिया जाता, और ऐसा करने के लिए केन्द्र के पास कुल जमा राशि में से एक निश्चित राशि स्थानीय सरकारों के इस्तेमाल के लिए अलग करनी होगी। स्थानीय सरकारों को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि वे अपने खर्चों का भुगतान इस राशि में से ही करें और अपनी आय तथा खर्च में सामंजस्य बनाए रखें।

इस तरह ये उसी निष्कर्ष पर पहुंचे जिस पर संघीय व्यवस्था के हिमायती पहले ही पहुंच चुके थे। लेकिन साम्राज्यवादियों को उनकी योजना स्वीकार कराने के लिए उन्होंने योजना के क्रियान्वयन को प्रभावित किए बिना कुछ छूट दे डाली। संघीय योजना के तहत भारत में सरकारी ढांचे में संवैधानिक परिवर्तन की आवश्यकता थी। इसका तात्पर्य था कि प्राप्त होने वाले राजस्व और प्रशासन की जिम्मेदारी का कानूनी रूप से केन्द्र सरकार और विभिन्न प्रांतीय सरकारों के बीच बंटवारा हो। साम्राज्यवादियों सहित सभी इस बात पर सहमत थे कि संघीय योजना वित्तीय जिम्मेदारी और बचत लागू करवाने का शक्तिशाली कदम है। उनका मुख्य विरोध यह था कि योजना कानूनी तथा स्थाई तौर पर केन्द्र सरकार को भारत की आय के स्रोतों से वंचित कर देगी। मंजे हुए