3 समझौता - साम्राज्यवादी प्रबंध रहित साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था - Page 119

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

राजनेता होने के नाते वित्त शास्त्रियों ने जल्दी ही संघीय योजना की इस कमी को दूर करने का रास्ता ढूंढ निकाला। ब्रिटिश संसद में कार्य करने के अनुभव का फायदा उठाते हुए उन्होंने यह जान लिया कि संविधान में परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है। परंपराएं भी कानून के समान ही प्रभावी हो सकती हैं और एक बार वे अपनी जड़ें जमा लें तो उन्हें हिलाना मुश्किल होता है। अतः केन्द्र और प्रांतीय सरकारों के बीच अधि कार क्षेत्र और राजस्व का बंटवारा एक ऐसी परंपरा का हिस्सा बनाए जाने की पेशकश की गई जो तब तक अक्षुण्ण बनी रह सकती है जब तक दोनों पक्षों को लाभ मिलता रहे। इस तरह भारत की आय के स्रोतों पर केन्द्र सरकार की पकड़ ढीली किए बगैर संघीय योजना के फायदे उठाए जा सकते थे। यह एक तरह से संवैधानिक साम्राज्यवाद और संवैधानिक संघवाद के बीच समझौता था। इसका मतलब था साम्राज्यवादी प्रबंधन के बिना साम्राज्यवादी वित्त समझौतों के तहत राजस्व और अधिकार क्षेत्र का स्तर तो केन्द्रीय ही बना रहा लेकिन उनका प्रबंधन प्रांतीय कर दिया गया। फलस्वरूप प्रत्येक प्रांतीय सरकार को केन्द्रीय सरकार के उस क्षेत्र में प्रशासन करने का अधिकार मिल गया जो उसके प्रांत में आता था और केन्द्रीय सरकार के राजस्व का वह अंश उसके हिस्से में आ गया जो उसके सीमा क्षेत्र में उगाहा जाता था। नई योजना का यह सार था। वह योजना संघीय योजना से इस अर्थ में अलग थी कि इसके तहत केन्द्रीय सरकार को भारतीय वित्त से संबंधित सभी मसलों पर सर्वोच्च नियंत्रण और परामर्श का अधि कार था जबकि वास्तव में भारतीय वित्त के एक हिस्से के प्रशासन संबंधी ब्यौरे को लेकर माथापच्ची करने की उसे कोई आवश्यकता नहीं रही थी।

वित्तीय व्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए बुलाए गए तीनों वित्त मंत्री योजना के मुख्य मसौदे पर पूरी तरह सहमत थे लेकिन योजना के क्रियान्वयन की सीमा को लेकर उनमें मतभेद था। यह संदिग्ध है कि श्री विल्सन ने योजना का अपना कोई प्रारूप तैयार किया। लेकिन यह निश्चित है कि इस तरह का विचार उनके मन में आया था। उनके द्वारा 1860 में लगाया गया 32वां आयकर कानून ‘‘दो हिस्सों में थाµ ‘‘पहला अस्थिर कर था जो आय के 3 प्रतिशत पर लगाया जाता था। यह प्रतिशत साम्राज्य की जरूरत के हिसाब से घटाया अथवा बढ़ाया जा सकता था और जिसे वित्तीय स्थिति सुधरने पर पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता था। दूसरी तरह का कर आय के 1 प्रतिशत पर लगाया जाने वाला ‘‘स्थाई कर’’ था। स्थाई कर लगाने का अधिकार स्थानीय प्रशासन को था और यह कर अदा करने वाले क्षेत्र के भीतर स्थित सड़क, नहरों आदि पर भी लगाया जा सकता था। (कानून की धारा 190-4) कर का यह हिस्सा कभी भी वापस नहीं लिया जा सकता था। न केवल निर्धारित मद के लिए बल्कि कर उगाहने वाले तंत्र को भी बनाए रखने के लिए इस कर का बनाए रखना जरूरी था। लेकिन विशेष