3 समझौता - साम्राज्यवादी प्रबंध रहित साम्राज्यवादी वित्त व्यवस्था - Page 123

108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अंश को अंतरित करने का प्रावधान है यह जरूरी हो गया है कि अंतरित

होने वाले सामान्य खर्चे के बदले एक राशि निश्चित की जाए और इसलिए

कर एकत्रित करने पर आने वाले खर्चे का अंतरण उचित लगता है। भूमि

राजस्व (लगान) एकत्रित करने में खर्चे के मद में राजस्व सर्वेक्षण में आई

लागत को शामिल नहीं किया गया था। क्योंकि यह लागत बदलती रहती है।

हां, ‘‘ग्रामीण अधिकारियों को मिलने वाला भत्ता अवश्य इस मद में शामिल

किया गया था।’’ राजस्व का पहला और मुख्य अंतरण भूमि राजस्व (लगान)

का एक हिस्सा होगा जिसका निर्धारण मैं रुपये के 1/16वें हिस्से अथवा एक

आना के बराबर करता हूं। यही दर राजस्व जमा करने पर आने वाले खर्चे के

अंतरित होने वाले हिस्से पर भी लागू होगी। राजस्व का अगला मद भविष्य में

लगाया जाने वाला आय कर है और लाइसेंस कर एक चौथाई हिस्सा होगा।’’ ख्1,

इसके बाद निम्नलिखित शीर्षों के तहत होने वाली पूरी आमदनी को अंतरित करने का प्रावधान हैµ (1) कानून और न्याय, (2) पुलिस, (3) शिक्षा, (4) मिश्रित (वित्तीय प्रकृति के विषयों को छोड़ कर) और (5) सिंचाई से होने वाली आय को छोड कर पुलिस कार्यों से होने वाली पूरी आमदनी। सार्वजनिक कार्यों के तहत आने वाले खर्चों के वे मद जिन्हें अंतरित किया जाना है, निम्न हैंµ (1) सड़कें, (2) नागरिक भवनों की मरम्मत, (3) नए और मरम्मत वाले विभिन्न कार्य और (4) संयंत्र एवं औजार।’’

इस तरह व्यापक बनाई गई योजना पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार विमर्श किया गया। हालांकि योजना को सतर्क आलोचकों ख्2, का समर्थन मिल चुका था लेकिन साम्राज्यवादियों को यह योजना जरूरत से अधिक व्यापक महसूस हुई, और चूंकि दो महान साम्राज्यवादियों, भारत के वायसराय लार्ड लारेंस और मद्रास के गवर्नर लार्ड नेपियर ने योजना का विरोध किया अतः इसे लागू नहीं किया जा सका। लेकिन साम्राज्यवादियों का दुर्भाग्य रहा कि वे पूरे एक दशक तक बीमार साम्राज्यवादी

  1. इस हिस्से का गणित करते हुए श्री मैसी ने लिखाःµ‘‘मैंने आयकर 2 प्रतिशत की दर से लगाया है

लेकिन 2,000 रुपये से कम पर आयकर नहीं लगेगा। लाइसेंस कर को मैं व्यापार कर मानता हूं जो

चालू सीमा के आरंभ में ही लगेगा और इससे आयकर की क्षति पूर्ति होगी।’’

  1. सर स्टेफर्ड नार्थकोट ने घोषणा की, ‘‘हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत की एक मात्र अर्थव्यवस्था

गड़बड़ाने न पाए और अनियंत्रित खर्चों पर काबू पाना चाहिए। हमारी व्यवस्था ने भारत का ऋण बहुत

अधिक कर दिया है और मैं तो इस व्यवस्था में किसी प्रकार की तबदीली नहीं करूंगा। फिर भी यह

बात फिर कहूंगा कि मैं श्री मैसी के सुझावों के सिद्धांतों का समर्थन करता हूं।’’ हांसार्ड के संसदीय

वाद विवाद, खंड 191, 23 अप्रैल 1868