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नियत बजट

(1871-72 से 1876-77 तक)

प्रांतीय बजट योजना की निर्माण प्रक्रिया के मूल के बारे में चर्चा हम पहले भाग में कर चुके हैं। अब हम पुनर्स्थापित योजना के प्रारूप और समय-समय पर इसमें हुए परिवर्तन के बारे में चर्चा करेंगे।

अपनी बुद्धिमत्ता के कारण लार्ड मेयो ने वित्तीय घाटे और उतार-चढ़ाव का कारण साम्राज्यवादी सरकार की अयोग्यता और प्रांतीय सरकारों के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार में ढूंढ निकाला और वह इस नतीजे पर पहुंचे कि प्रांतीय बजट व्यवस्था आरंभ करने से समस्या का समाधान उसकी विकृति के समान ही होगा। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि स्थिति अभी भी साम्राज्यवादी हितों के पक्ष में थी और जबकि हर कोई किसी के हितों की बलि चढ़ा कर ऐसा नहीं करना चाहता था। यहां तक कि लार्ड मेयो भी साम्राज्यवादी हितों के प्रति झुकाव से मुक्त नहीं थे। लेकिन भ्रामक स्थितियों के बढ़ते दबाव ने उन्हें भी चली आ रही अनिर्णय और समंजस की स्थिति से गुजरने पर मजबूर कर दिया, हालांकि प्रांतीय बजट के प्रारूप को तय करने में उन्होंने फूंक-फूंक कर कदम उठाए।

वास्तव में 1871-72 के वित्तीय वर्ष से लागू की गई इस योजना की सबसे पहले चर्चा भारत सरकार के गृह विभाग द्वारा 21 फरवरी 1870 को जारी एक सर्कुलर में की गई थी। सर्कुलर में कटौती की नीति को व्यापक आयाम देते हुए 1869-70 के आरंभ में सड़क मद पर खर्चे की जो राशि 1,236,000 पौंड रखी गई थी वह वर्ष के अंत में घटा कर 1,021,178 पौंड कर दी गई। इसी प्रकार 1870-71 के प्राक्कलन को 1,000,000 पौंड से घटा कर 784,839 पौंड कर दिया गया जिसमें विभिन्न सार्वजनिक सुविधाओं की बेहतरी के लिए 29,110 पौंड की अतिरिक्त राशि जोड़ दी गई। सर्कुलर के माध्यम से प्रांतीय सरकारों को यह बताने की कोशिश की