114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गई कि ‘‘संचार तथा सड़क शीर्षों पर साम्राज्यवादी अनुदान राशि में कटौती वर्तमान वित्तीय ”ास के दबाव के कारण उठाया गया अस्थाई कदम नहीं है बल्कि तयशुदा नीति का परिणाम है। नीति अस्थाई कारणों के प्रभाव से स्वतंत्र है और जानबूझ कर अपनाई गई है और इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले वर्षों में इन शीर्षों पर मिलने वाली विशेष अनुदान राशि बढ़ाने की बजाए घटा दी जाए। अतः यह जरूरी हो जाता है कि बिना समय गंवाए वर्तमान प्रांतीय और जिला स्तर की सड़कों के रख-रखाव तथा संचार की नई लाइनों के बिछाने के लिए स्थानीय स्रोतों से निधिया जुटाने का प्रावधान किया जाए।’’
स्थानीय जरूरतों को स्थानीय संसाधनों द्वारा पूरा किए जाने का विचार तत्कालीन भारतीय पूंजीपतियों का आदर्श रहा था। लेकिन यह स्पष्ट है कि तब तक यह विचार शास्त्रीय बहस से ऊपर उठ चुका था क्योंकि सर्कुलर में कहा गया था ‘‘कि परिषद् में गवर्नर जनरल ने पूरी तरह से यह फैसला किया है कि भविष्य में वह इस सिद्धांत को पूरी तरह लागू करने पर जोर देंगे।’’ अनेक स्थानीय सरकारों ने परिपत्र (सर्कुलर) में व्यक्त भारत सरकार की भावनाओं को गंभीरतापूर्वक लिया और निजी स्थानीय संसाधनों के विकास का कार्य करने लगीं। बंबई प्रेसीडेंसी ने भूमि राजस्व (लगान) पर 6 - प्रतिशत उपकर (चुंगी) लगा दी, जिसका दो-तिहाई हिस्सा सड़कों के रख-रखाव तथा सार्वजनिक उपयोगिता के कार्यों के लिए अलग रख दिया गया। 1866 के पुराने कानून के तहत मद्रास सरकार ने जिले की सड़कों के रख-रखाव के लिए भूमि राजस्व (लगान) की राशि पर वार्षिक किराए पर प्रति रुपया आधा आना प्रदान की, जो 3 ½ प्रतिशत के बराबर थी। बंगाल सरकार ने भी मद्रास की सरकार की भांति कदम उठाने की इच्छा जाहिर कर दी थी। स्थानीय सरकारों द्वारा उठाए गए इन कदमों से उत्साहित होकर परिपत्र (सर्कुलर) में अन्य स्थानीय सरकारों तथा उत्तर भारत के उत्तर पश्चिमी प्रांतों पंजाब, अवध और केन्द्रीय प्रांतों (सूबों) के प्रशासनों से अनुरोध किया गया कि वे भूमि राजस्व पर लगने वाली चुंगी को बढ़ा कर 5 प्रतिशत करने की संभावना पर विचार करें। इस कदम का उद्देश्य प्रांतीय सरकारों के हिस्से में अच्छा खासा राजस्व आ जाने की स्थिति में साम्राज्यवादी कोष पर दबाव को कम करना था।
इस तरह परिपत्र (सर्कुलर) में प्रांतीय बजट की एक बहुत मितव्ययी योजना तैयार की गई थी जिसमें केवल स्थानीय सार्वजनिक सुविधाओं पर होने वाले खर्च और इन खर्चो से निपटने के लिए स्थानीय संसाधनों से पैदा किए गए राजस्व का प्रावधान था। लेकिन इस योजना को कार्यान्वित करने से पहले ही भारत सरकार की वित्तीय कठिनाइयों ने सहायता के बड़े कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। चूंकि हालात पहले से ही बदतर थे अतः अफीम के राजस्व के स्थायित्व पर ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता था। और जबकि खर्चो में कटौती की जा रही थी, सार्वजनिक ऋण पर ब्याज की भुगतान राशि अत्यधिक बढ़ चुकी थी। ऐसी विषम परिस्थिति