132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘कि प्रांतीय बजट को विनियोग विधेयक की अनुसूची में शामिल कर लिया जाए जिसके विषयों पर आवश्यक दलीलों और बहस के उपरांत धारा दर धारा मतदान कराया जाए।’’ लेकिन स्वयं सबसे पहले विषय प्रवर्त्तन करने वाली भारत सरकार इस सुझाव से हत्प्रभ हो उठी। उसे यह क्रांतिकारी कदम लगने लगा। अपने जवाब ख्1, में उसने कहाःµ
- ‘‘परिषद् में महामहिम ऐसा नहीं मानते कि वार्षिक वित्तीय वक्तव्य को भारतीय
परिषद् के कानून की धाराओं के तहत लाना उचित या संभव होगा। हाउस ऑफ
कामन्स द्वारा विनियोग विधेयक को पारित करना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके
द्वारा विधानसभा के संकल्पों को कमेटी ऑफ सप्लाई में लागू किया जा सके,
और जो विनियोग विधेयक के पारित होने तक कानून का रूप नहीं ले सके।
विधेयक अधिवेशन के दौरान दी गई प्रत्येक सहायता राशि की चर्चा करता है
और कमेटी ऑफ सप्लाई द्वारा पारित विभिन्न राशियों को जारी करने तथा प्रत्येक
अलग सेवा में लागू करने का अधिकार देता है। विधेयक में यह भी कहा गया
है कि विभिन्न सहायता और पूर्तियां उन्हीं प्रयोजनों में जारी या लागू की जाएंगी
जिनका उल्लेख किया गया है।
- ‘‘परिषद् में महामहिम मानते हैं कि इस तरह की प्रक्रिया भारत में उचित नहीं होगी
और हो सकता है कि लोकधन के वितरण संबंधी समस्त शक्तियां कार्यपालिका के
हाथ से निकल कर विधायिका के हाथों में पहुंच जाएं। अतः महामहिम महोदय
ऐसा मानते हैं कि विनियोग विधेयक को पेश करना उचित नहीं होगा।’’
इस आदेश के विरोध में मद्रास सरकार ने भारत सचिव ख्2, से प्रार्थना की कि या तो वार्षिक विनियोग कानून का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाए या फिरःµ
‘‘परिषद् के कानून में ऐसा बदलाव लाया जाए जो वित्तीय वक्तव्य को कानूनी तौर पर बनाया गया और स्थानीय विधान परिषद् में बहस करने के काबिल माने जाने की अनुमति देता हो।’’
लेकिन भारत सचिव ने भारत सरकार के निर्णय ख्3, को ही सही माना और उसके कारण देते हुए कहा किःµ
‘‘इस तरह की प्रक्रिया कार्यकारिणी पर पूरी तरह से नियंत्रण रखने वाली जन-प्रतिनिधि सभा में ही लागू हो सकती है। और ऐसी कोई भी शक्ति संसद ने भारत की विधान परिषद् से अलग रखी है।’’
मद्रास को लिखा वैधानिक पत्र संख्या 765, दि. 11 जुलाई, 1871
19 सितम्बर, 1871 को मद्रास सरकार के वित्तीय विभाग द्वारा भारत सचिव को लिखा गया पत्र और
इसके साथ ही पूरा पत्र-व्यवहार।
- 18 जनवरी, 1872 को भारत सरकार को भेजा गया वैधानिक संदेश सं. 4