154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
1879 में साम्राज्यवादी सरकार की वित्तीय हालत काफी ढीली हो गई थी। रुपये के अवमूल्यन तथा अफगानियों के साथ झड़पों की शुरुआत के कारण वर्ष 1979-80 में घाटा। 395,000 पौंड तक पहुंच जाने की उम्मीद थी। रक्षा के पहले कदम के तौर पर भारत सरकार ने तमाम स्थानीय सरकारों और प्रशासनों से प्रार्थना की कि वे देश का सामान्य खर्चा कम से कम करें और उन्हें निर्देश दिए कि साम्राज्यवादी प्रांतीय अथवा स्थानीय सभी तरह के स्वैच्छिक खर्चों को तुरंत रोके जाने के प्रयास किये जाने चाहिए तथा वास्तविक आवश्यकता के बिना केवल अथवा प्रतिष्ठान में बढ़ोतरी के किसी भी प्रस्ताव पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए। ख्1, रक्षा के दूसरे कदम के रूप में भारत सरकार ने आदेश दिया कि तब तक ‘‘स्थानीय सरकारों के साथ व्यवस्था या प्रबंध किए जा सकते हैं.... 2,500 रुपये से अधिक लागत का कोई भी नया कार्य साम्राज्यवादी अथवा प्रांतीय निधि से आरंभ नहीं किया जा सकता। भले ही उसे सरकार की संस्तुति मिल चुकी हो।’’ ख्2, और उत्पादक लोक निर्माण के कार्यों पर खर्चे में खासी कटौती करने का निर्णय लिया। जब यह पता चला कि खर्चा पर ये कटौतियां साम्राज्यवादी बजट में बराबरी लाने के लिये अधिक नहीं थी, तब भारत सरकार ने प्रांतीय बचत पर जबरी ऋण लगाने की व्यवस्था अपनाई। वास्तव में यह कदम प्रांतीय वित्त की मूलभूत शर्तों में से एक शर्त का हनन करता था। यह शर्त थी कि साम्राज्यवादी सरकार के आधिपत्य में होने के बावजूद प्रांतीय बचत एक पवित्र ट्रस्ट थी जिन्हें प्रांतों द्वारा आवश्यकता पड़ने पर ही निकाला जा सकता था। लेकिन प्रांतीय वित्त की शर्तों की पवित्रता की तुलना में भारत की सम्पन्नता को अधिक पवित्र समझा गया। उसी के अनुसार प्रांतीय सरकारों की बचत में से साम्राज्यवादी सरकार द्वारा निम्न राशि निकाल ली गईः’’
प्रांत साम्राज्यवादी सरकार को दिया गया अंशदान
1879-80 1880-81 कुल योग, लाख में
रु. रु. रु.
1 2 3 4
उत्तर पश्चिमी प्रांत 10 10 20
उत्तर पश्चिमी प्रांत 7 ½ 7 ½ 15
बंबई 4 4 8
पंजाब 3 3 6
वित्तीय विभाग का प्रस्ताव, संख्या 4063, दिनांक 9 नवंबर, 1878
वित्तीय विभाग का प्रस्ताव, दिनांक 1 मई, 1879 का भारत का गजट, भाग एक, 3 मई, 1879, पृष्ठ 329