निर्दिष्ट राजस्व बजट
155
1 2 3 4
बर्मा 3 3 6
सी. पी. (केन्द्रीय प्रांत) 2 ½ 2 ½ 5
मद्रास 2 2 4
असम 1 ½ 1 ½ 3
कुल 33 ½ 33 ½ 67
यह अंशदान प्रांतों को 1882-83 में दिया गया लेकिन उस समय तो इस राशि ने साम्राज्यवादी कोष के लिए लाभ अथवा राहत का काम किया। साम्राज्यवादी कोष को वास्तविक लाभ तो प्रांतीय प्रबंधन को अंतरित सेवाओं के लिए आबंटन में कटौती करने से हुआ। प्रत्येक प्रांत की राशि में की गई कटौती संक्षेप में निम्नलिखित हैःµ
प्रांत रु. कटौती
उत्तर पश्चिमी प्रांत 3,54,000 कुल आबंटन का 5 प्रतिशत
अवध 73,000 कुल आबंटन का 5 प्रतिशत
बंगाल 5,90,000 कुल आबंटन का 5 प्रतिशत
केन्द्रीय प्रांत 90,000 कुल आबंटन का 5 प्रतिशत
बंबई 73,000 कुल आबंटन का 5 प्रतिशत
पंजाब 2,41,000 कुल आबंटन का 5 प्रतिशत
यह साम्राज्यवादी सरकार द्वारा उठाए गए लाभ का पूरा ब्यौरा नहीं है। इसके साथ-साथ लाभ कमाने के दो और रास्तों का जिक्र करना जरूरी है। ध्यान देने योग्य है, कि इतिहास द्वारा न्यायोचित स्तर से ऊपर स्तर पर निर्दिष्ट राजस्व की मानक आय लेकर भारत सरकार प्रांतीय सेवाओं के लिए घटी हुई राशि नियत कर सकी। यदि मानक आय निचले स्तर पर ली गई होती तो यह ऐसा कतई नहीं कर पाती। अलग किए गए राजस्व के बढ़े-चढ़े अनुमान के कारण आबंटन में हुई घटत सीधा लाभ था। मानक से अधिक आय ने राजस्व रोकने वाली धारा के कारण लाभ की अतिरिक्त संभावनाओं के द्वार खोल दिए। हालांकि यह भी सत्य है कि मानक से कम राजस्व प्राप्ति की स्थिति में उसी धारा के तहत भारत सरकार नुकसान उठाने के लिए