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सांझा राजस्व बजट

(1882-83 से 1920-21)

हर कदम पर प्रांतों के बजट में वृद्धि करने की दिशा में एक कठिन समस्या, जिसका पहले ही जिक्र किया जा चुका है, वह थी राजस्व और व्यय की मदों के संतुलन संबंधी कठिनाइयां जिन्हें कि उसमें सम्मिलित करना प्रस्तावित था। प्रांतीय वित्त के विकास की दिशा में जो अब तक दो कदम उठाए गए थे, एक सन् 1871 में, दूसरा 1877 में, उनमें प्रांतीय बजट संतुलन के लिए दो भिन्न विधियां अपनाई गई थीं। प्रथम अवसर पर शाही (साम्राज्यवादी) सरकार ने प्रांतीय सरकारों को शाही कोष से एकमुश्त निश्चित आवंटन का प्रावधान किया था, दूसरे अवसर पर इस प्रकार के प्रदाय को आंशिक तौर पर प्रांतीय सरकारों के व्यय हेतु राजस्व प्राप्ति के विशेष स्रोत निर्धारित कर दिए गए। निर्दिष्ट राजस्व की योजना ने यद्यपि सन् 1871-72 के उपायों की अत्यंत गंभीर त्रुटि को काफी हद तक दूर करने में सहायता की, जिसने स्थानीय सरकारों को व्यय-भार-वहन करने का उत्तरदायित्व दे दिया था, निसंदेह जिनकी कि वृद्धि की संभावनाएं बनी रहती थी। आमदनी के साथ, जो कि यद्यपि बिल्कुल निश्चित नहीं थी, उसके बढ़ने के कम आसार थे, जिससे लोच की दृष्टि से प्रांतीय वित्त की आवश्यकताएं अपूर्ण रह गई थीं। सन् 1877 के उपाय, जो कि हर हालत में 1871 से श्रेष्ठ थे, वित्तीय लोच की पूर्णतम आवश्यकताओं को पूरा करने में यहां तक असमर्थ थे कि मद्रास सरकार ने संशोधित योजना को मानने से इंकार कर दिया और सन् 1871 के उपायों को मानने में प्राथमिकता बरती। सन् 1877 की योजना बर्मा अथवा असम में लागू नहीं की गई थी। लेकिन जब भारत सरकार ने सन् 1879 में यह प्रस्ताव रखा तो इसने एक नये अध्याय की शुरुआत की, यद्यपि बढ़े हुए व्यय भार को नियत आवंटन के अंतर्गत कुछ प्रांतों को किफायत और अच्छे इंतजाम के जरिए सफलता मिली, लेकिन बार्मा प्रांत में इसे पूरी तरह अनुभव किया गया। प्रांतीय वित्त की योजना के पहले के सात वर्षों में प्रांतीय व्यय का कुल जोड़