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सांझा राजस्व बजट

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निर्धारित मात्रा में बांट लिए गए थे। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रांतीय राजस्व की अपरिवर्तनशीलता को लोच में बदलना था। अन्य प्रांतों के वित्त में लोच था जहां तक कि उनके आबंटन राजस्व के निर्धारित स्रोतों में बदल दिए गए। लेकिन उनके राजस्व की मात्र जो कि उनके निर्धारित आबंटन से बनी थी, उनके वित्त अपरिहार्य रूप से अपरिवर्तनशीलता के शिकार बने। बर्मा के मामले में यद्यपि, निश्ति आबंटन के लिए बढ़ते हुए राजस्व की भागीदारी के मिलान से प्रांतीय वित्त को पूर्ण लोच प्राप्त हुआ जिसके बिना बढ़ते हुए व्यय का निर्वाह बड़ा दुष्कर हो गया था।

भागीदारी के राजस्व के सिद्धांत पर आधारित बर्मा के प्रांतीय बजट के ढांचे की पुनर्रचना में आय और व्यय के सभी शीर्ष पूर्णतया प्रांतीय बना दिए गए थे, निम्नलिखित को छोड़ कर जिन्हें कि पूर्णतया शाही (साम्राज्यवादी) समझा गया थाःµ

  1. सेना - आय और व्यय

  2. पोस्ट ऑफिस - आय और व्यय

  3. टेलीग्राफ - आय और व्यय

  4. लेखा विभाग - आय और व्यय

  5. मौसम विभाग - आय और व्यय

  6. राजनीतिक - आय और व्यय

  7. कोष और विनिमय बिलों - आय और व्यय

पर प्रीमियम तथा विनियम के बिना

दावे के बिल

राजस्व और व्यय की तीसरी श्रेणी, जिसे संयुक्त रूप से शाही और प्रांतीय कहा गया, उसमें निम्न मदें सम्मिलित थींःµ

  1. भूराजस्व, प्रतिव्यक्ति शुल्क सहित, लेकिन मत्स्य पालन को छोड़कर, साथ में

भूराजस्व वापिसी, संग्रह और निपटान संबंधी व्यय जिन्हें मात्र मत्स्य पालन से

ही नहीं जोड़ा जा सकता।

  1. वन राजस्व, व्यय और वापिसी।

  2. चावल पर निर्यात शुल्क, तथा वापिसी।

  3. नमक राजस्व, व्यय और वापिसी।