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सांझा राजस्व बजट

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है कि यह उद्देश्य बहुत सफल होता यदि बंदोबस्त की अवधि वर्तमान काल से लंबी अवधि के लिए होती। लेकिन एक लंबी अवधि शाही कोष को उसके लाभ के अधिकार से वंचित रखती यदि समझौते के अनुसार राजस्व पक्ष का शीघ्र संशोधन कर दिया जाता। यही वह विचार था जिससे देर तक धनाभाव सहन नहीं किया जा सकता था जिसने कि भारत सरकार को करार की अवधि को जितना भी संभव था कम करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन साम्राज्यवादी कोष के लिए जो एक फायदा था वह प्रांतीय सरकारों की दृष्टि में उनके लिए गहरा नुकसान था। बंदोबस्त की अवधि कम होने की वजह से प्रांतीय सरकारें ऐसी स्थिति में नहीं थीं कि उनके पास जो धनराशि थी उसे समन्वित सेवाओं में व्यय करके अपने वित्तीय इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकें। वे एक सुनिश्चित अर्थनीति नहीं अपना सकीं, क्योंकि उन्हें भय था कि नवीनीकरण की नई शर्तें या तो उन्हें योजना छोड़ देने अथवा उसमें बहुत अधिक परिवर्तन के लिए इतना बाध्य करेंगी, जिसके परिणाम पूर्वाग्रह ग्रसित होंगे। एक अकेला बजट इस तथ्य से और अधिक कुछ नहीं कि उसमें वर्ष की आर्थिक घटनाओं की वैचारिकता निहित होती है जिससे कि वह संबंधित है लेकिन वित्तपोषक के लिए जो उसकी वर्ष दर वर्ष रचना करता है उसमें एक निश्चित नीति का समावेश करता है जो उसे संसिद्धि की ओर ले जाती है। लेकिन एक नीति चाहे वह कितनी भी बुद्धिमत्ता से अपनाई गई हो और जिन परिस्थितियों की एकरूपता पर उसकी सफलता निर्भर है एक मूर्खतापूर्ण अवरोध से बिखर जाती है। इसी झंझावात ने प्रांतीय वित्त के युक्ति-युक्त प्रचलन को क्षति पहुंचाई, बारंबार के नवीनीकरण ने इसे नुकसान पहुंचाया और उनमें से किसी भी दो के मध्य समयावधि वास्तव में इतनी अल्प थी कि जिससे हालात को स्थायित्व प्राप्त नहीं हुआ।

इस तथ्य से प्रभावित होकर कि साम्राज्यवादी कोष के फायदे के लिए अल्पावधि की शर्त प्रांतीय वित्त की हानियों से पूरी तरह असंतुष्ट थी, भारत सरकार ने सन् 1882 के बंदोबस्त को संशोधित करने के अवसर पर एक निश्चित नियम बना दिया कि उनकी समयावधि पांच वर्ष की होगी, यानि उनका संशोधन उनके शुरू होने की तिथि से पांच वर्ष खत्म होने तक नहीं किया जा सकेगा।

1887-88 का संशोधन

इस नियम के आधार पर जो बंदोबस्त 1882-83 में हुए वे सन् 1887 में समाप्त हुए। बाद में जो संशोधन किए गए साथ में पूरक भी, उन्होंने नियम के मुताबिक राजस्व और व्यय की पूर्ण प्रांतीय अथवा पूर्ण साम्राज्यवादी दोनों ही श्रेणियों को अबाधित छोड़ा। अंततः यह एक परंपरा बन गई कि सन् 1882 के विभाजन के