172 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बाद उन्हें यथावत छोड़ दिया जाए, जबकि प्रांतीय बजटों की रचना का पूरी तरह काया पलट और समन्वयन किया जा रहा था। राजस्व और व्यय के केवल जो शीर्ष संशोधित किए गए, क्योंकि संशोधन देय हो गया था, और तीसरी श्रेणी के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया अथवा पूर्णरूपेण साम्राज्यवादी और प्रांतीय उन्हें ‘‘विभाजित शीर्ष’’ नाम से भी जाना गया।
सन् 1887-88 के संशोधन में निर्णायक तथ्य साम्राज्यवादी वित्त की असंतोषजनक स्थिति थी जिसका पहले उल्लेख किया जा चुका है। इसकी आर्थिक दशा में सुधार हेतु संयुक्त शीर्ष के अंतर्गत भागीदारी को बदला गया जिससे कि प्रत्येक स्थानीय सरकार को तीन चौथाई स्टाम्प्स (टिकटों) और एक चौथाई आबकारी राजस्व के विनियोग की अनुमति प्राप्त हो गई और उनसे आशा की गई कि ठीक अनुपात में उन शीर्षों के अंतर्गत व्यय भार सहन कर सकें। भू-राजस्व का अनुपात भी बदला गया जिसे तीन चौथाई साम्राज्यवादी बना दिया गया और एक चौथाई प्रांतीय। लेकिन साम्राज्यवादी कोष की आवश्यकताएं इतनी अधिक थीं कि भारत सरकार को अन्य दो श्रेणियों के कुछ शीर्षों को भी अपने लाभ के लिए बदलना पड़ा जैसे कि नमक, सीमा शुल्क, ब्याज, सिंचाई और रेलवे। साम्राज्यवादी कोष को जो लाभ प्राप्त हुए उसका विवरण निम्न प्रकार हैःµ
राजस्व साम्राज्यवादी शुद्ध लाभ
भागीदारी बढ़ी
हुई, घटी हुई
(1) (2) (3)
भू-राजस्व 437,500
स्टाम्प्स (भागीदारी 1/2 से 1/4 कर
दी गई) -810,000
आबकारी (भागीदारी 1/2 से 3/4 बढ़ाई गई) 947,500
नमक राजस्व (बर्मा का) साम्राज्यवादी कर दिया गया 5,000
सीमा शुल्क (बर्मा का) साम्राज्यवादी कर दिया गया 155,000
निर्धारित कर आधा कर दिया गया 290,000 215,000
राज्य रेलवे की सकल आय
नागपुर-छत्तीसगढ़
पटना-गया -310,000
कानपुर-अछनेरा