178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की आवश्यकता को प्रतिबंधित करे क्योंकि भारत सरकार ने कीमत अदा करके यह सीख लिया था कि बड़े पैमाने पर निश्चित आबंटन प्रांतीय वित्त के संसाधन पक्ष को एक असुविधाजनक मात्रा तक कठोर बनाते हैं। यदि व्यय की परिवर्तनशीलता प्रांतीय बजट में सम्मिलित राजस्व की विस्तारशीलता का अतिक्रमण कर जाती है तो इसे मजबूरन एक कठिन स्थिति को संभालने के लिए अनुकंपा राशि वितरित करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। दूसरे ये निश्चित आबंटन एक निश्चित मात्रा में असमानता को भी जन्म देते हैं जैसी कि पिछड़े और उन्नत प्रांतों के मध्य होती है। उन्नत प्रांतों में निश्चित आबंटन उनके संसाधनों का तुलनात्मक रूप में एक छोटा सा हिस्सा ही बना, जबकि पिछड़े प्रांतों के मामले में आनुपातिक तौर पर यह भिन्न था। और चूंकि प्रांत तभी अधिक व्यय कर सकते थे जबकि उनके राजस्व-वृद्धि होती, उन्नत प्रांतों के अधिकतर राजस्व की प्रवृत्ति परिवर्द्धनशील थी इसलिए पिछड़े प्रांतों की तुलना में उनके साथ अच्छा बर्ताव होता था जिसके कि संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा स्थिर प्रवृत्ति का था। भारत सरकार का यह अभिमत ठीक ही था कि जैसा कि उसके विपरीत भी हो सकता था, पिछड़े प्रांतों की जरूरतें उन्नत प्रांतों के मुकाबले अधिक निरंकुश थीं। इस अन्याय को दूर करने के लिए भारत सरकार ने पिछड़े प्रांतों की साझेदारी पिछले संशोधन में निश्चित आबंटन को घटाकर संयुक्त राजस्व में बढ़ा दी। सिर्फ 25 की बजाय भू-राजस्व का इसने पंजाब को 4 और मध्य प्रांत को 5 प्रदान किया। भू-राजस्व में बर्मा का हिस्सा 66 बढ़ा दिया गया और ऊपरी बर्मा के जुड़ने के कारण बढ़े हुए व्यय का प्रावधान किया गया। इससे रेलवे राजस्व की वापिसी के बदले बर्मा को मात्र .25 के बजाए .5 का उत्पाद शुल्क लगाने का अधिकार प्रदान किया गया। उत्तर पश्चिम प्रांत की आर्थिक दशा बहुत अच्छी नहीं थी। इसके राजस्व में कोई बहुत वृद्धि नहीं हुई। इसका राजस्व इतना भारी अप्रगतिशील था कि 1892 और 1897 के मध्य मात्र 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। सन् 1892 के संशोधन में उत्तर पश्चिम प्रांत के साथ जो व्यवहार किया गया उसमें थोड़ा अन्याय अवश्य था। संशोधन में इसके मानक व्यय में 5 लाख के राजस्व का घाटा रहा, जिसे इसके संतुलन में कमी करके पूरा किया गया। इसके सुधार के लिए भारत सरकार ने उत्तर पश्चिम प्रांत के लाभ हेतु भू-राजस्व में हिस्से को पुनर्विभाजित किया। इसके अतिरिक्त भारत सरकार ने उस प्रांत को वर्ष 1897-98 के लिए 4 लाख का अनुदान प्रदान किया ताकि यह आर्थिक रूप से स्वतंत्र आधार पर जिला निधि स्थापित कर सके जिसे ब्रिटिश भारत के हर प्रांत में बहुत पहले ही लागू किया जा चुका था। पिछड़े और साथ ही उन्नत प्रांतों के साथ न्यायोचित व्यवहार सुनिश्चित करने की दिशा में इसने यह महसूस कर लिया था कि एक असमान व्यवहार ही सबसे अच्छा तरीका था। इसलिए इसने बदोबस्त की शर्तों के संशोधन में बंगाल, मद्रास और बंबई