सांझा राजस्व बजट
185
स्वतंत्रता दी गई कि वे व्यय के मामले में और सफलतापूर्वक अपने संसाधन बढ़ाने में पांच वर्ष तक अपनी अर्थव्यवस्था के फल भोगें।
यद्यपि यह यथासंभव लाभप्रद था, लेकिन समय की पाबंदी ने प्रांतीय वित्त पर बड़ा कठोर असर डाला। पांच वर्षीय बजट प्रणाली में ऐसा हुआ कि नई परिस्थितियों में प्रांतीय सरकारें प्रथम कुछ वर्षों में कंजूसी करने लगीं थी, जब तक कि उनके व्यय राजस्व से अधिक प्रमाणित नहीं हो जाएं। और अंतिम कुछ वर्षों का फिजूल
खर्च ऐसा न हो कि उनका व्यय एक स्तर से बढ़ कर अधिक हो जाए कि भारत सरकार को उनके बंदोबस्त करते समय जो अधिक अंतर है उसे रद्द करना पड़े। किसी भी स्थानीय सरकार ने ऐसी आशा नहीं की थी कि वह पांच वर्ष के अल्पकाल में सुधार की कोई परिपक्व और सुविचारित योजना लागू कर सके। यह सिर्फ इतना ही कर सकती थी कि पहले दो तीन वर्ष किसी योजना को बनाने में लगाती और बाकी दो तीन वर्ष इस पर अमल करने में, जैसाकि बहुत से प्रांतों ने किया। इस प्रकार की योजनाओं को चलाने की प्रवृत्ति जिसका कि मात्र गुण यह था कि इसे संशोधन के पूर्व लागू किया जा सकता था और वह इस लिए कि मानक व्यय के करीब पहुंचा जा सके, जो कि निश्चय ही पंचवर्षीय बजट प्रणाली का सीधा नतीजा था। यह किसी भी प्रकार एक पूर्व आकलित परिणाम नहीं हैं। प्रांतों के वार्षिक लाभ का अध्ययन करने पर पता चलता है कि पांच वर्ष की अवधि के शुरुआत में वृद्धि दिखाई देती है और इसके अंत में गिरावट। इन किफायत और फिजूल खर्ची के दोषों के निराकरण हेतु मात्र उपचार यह था कि पंचवर्षीय संशोधन प्रणाली से छुटकारा पाया जाए और भारत सरकार ने इस पर साहसपूर्वक अमल भी किया। संशोधन का अधिकार बहुत दिनों से विचार किया हुआ अधिकार था और भारत सरकार इस पर अमल करने में असफल नहीं हुई जबकि प्रांतों की ओर से इसका विरोध किया जा रहा था। इसे तभी लागू किया गया जब यह पाया गया कि इस पर अमल करना हानिकारक है।
वर्ष 1903-4 को सामान्य वर्ष मानते हुए भारत सरकार ने विभिन्न प्रांतों के बंदोबस्त संशोधित करने का निश्चिय किया। विचार यह था कि साम्राज्यवादी और प्रांतीय सरकारों के मध्य राजस्व को पूर्ण व्यय के आधार पर जिसे वे क्रमशः नियंत्रित किए हुए थे समायोजित किया जाए। ऐसा ज्ञात हुआ कि प्रांतीय व्यय का योग संपूर्ण व्यय के एक चौथाई से भी कम था, जबकि साम्राज्यवादी व्यय जिसमें सेना और गृह व्यय भी शामिल था तीन चौथाई से भी अधिक था। व्यय का यह औसत साम्राज्यवादी और प्रांतीय व्यय के मध्य राजस्व के विभाजन का आधार माना गया