सांझा राजस्व बजट
189
इन दो प्रांतों के मानक राजस्व और व्यय अर्द्ध-स्थाई बंदोबस्त के अंतर्गत निम्न प्रकार थेःµ
प्रांत व्यय राजस्व
राजस्व निश्चित नियतन रुपए
बंबई 4,91,75,000 4,48,000 42,77,000 4,91,75,000
पंजाब 2,49,50,000 2,46,50,000 3,00,000 2,49,50,000
अकाल और प्लेग पीडि़त प्रांतों के मामलों में उदारतापूर्ण हिस्सेदारी में वृद्धि और आबंटन निश्चित करने के कारण साम्राज्यवादी सरकार को इस लेनदेन में हानि उठानी पड़ी। राजस्व के नए मानक के आधार पर भारत सरकार को दो प्रांतों पर एक साथ 5,95,000 रुपए का नुकसान हुआ। व्यय के संयुक्त शीर्ष में प्रांतीय हिस्सेदारी में जो समानांतर वृद्धि हुई, उससे तथापि एक वर्ष में साम्राज्यवादी व्यय में 2,21,000 रुपए कम हुए। इसलिए कुल मिलाकर साम्राज्यवादी सरकार ने 3,74,000 रुपए के सामान्य लाभ की बलि दे दी ताकि इन दोनों प्रांतों के वित्त को स्थायित्व और मजबूती मिल सके। यह सब 50,00,000 रुपए के प्रारंभिक अनुदान के अलावा था जो प्रत्येक को प्रदान किया गया था ताकि वे अपना कार्य ठीक प्रकार से निभा सकें।
एक वर्ष के उपरांत मध्य प्रांत के बंदोबस्त को पहली अप्रैल, 1906 से अर्द्ध-स्थाई बनाया गया। राजस्व और व्यय के संयुक्त शीर्ष में हिस्सेदारी बढ़ाई गई जैसा कि बंबई और पंजाब के मामले में किया गया था, विशेषकर इसलिए भी कि इसमें बरार को भी जोड़ दिया गया था जो अब तक सीधे तौर पर साम्राज्यवादी सरकार द्वारा शासित होता था, साम्राज्यवादी और प्रांतीय के मध्य तीन चौथाई और एक चौथाई से एक का आधा और भू-राजस्व में 82 ½ लाख की भागीदरी की गारंटी प्रदान की गई। इस सम विभाजन के नियम का एकमात्र अपवाद पंजीकरण राजस्व था जिसे पूर्णतया प्रांतीय कर दिया गया था। राजस्व का व्यय के साथ संतुलन रखने के लिए एक वर्ष में 27,07,007 रुपये का आबंटन निश्चित किया गया और एक अच्छी शुरुआत के लिए 30,00,000 रुपए के प्रांरभिक अनुदान का प्रबंध किया गया।
मध्य प्रांत के बंदोबस्त के साथ-साथ अर्द्ध-स्थाई बंदोबस्त किए गए। बंगाल और असम प्रांतों के बजट को विशेष प्रशासनिक परिवर्तनों की वजह से पुनर्गठित करना आवश्यक था। दो प्रांत जिनका पुनर्गठन किया गया वे थे (1) बंगाल और (2) पूर्व बंगाल और असम। नए प्रांत बंगाल को उसके वित्तीय बंदोबस्त के संशोधन में उसी के अनुपात में संयुक्त राजस्व में हिस्सा दिया गया जैसा कि