190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बंबई और पंजाब को दिया गया था। अर्थात् सभी संयुक्त शीर्षों में आधा हिस्सा। साम्राज्यवादी सरकार के सीधे नियंत्रण में पंजीकरण और भू-राजस्व का वह भाग जो सरकारी भू-संपत्तियों से प्राप्त होता था उसे पूर्णतया प्रांतीय बना दिया गया। इस अनुकूल व्यवहार की वजह, प्रांत के निश्चित आबंटन को 49.03 लाख से घटा कर 5.75 लाख कर दिया गया।
पूर्व बंगाल और असम के नए प्रांत में सम विभाजन का सिद्धांत सभी राजस्व और व्यय के संयुक्त-शीर्षों पर लागू किया गया पंजीकरण के सिवाय, जिसे पूर्ण प्रांतीय बनाया गया था। हिस्सेदारी में इस वृद्धि ने प्रांतीय बजट के संसाधन पक्ष को इतना बढ़ाया कि संतुलन बनाए रखने के लिए निश्चित समायोजित आबंटन को प्रांतीय से साम्राज्यवादी कोष में निषेधात्मक कार्यवाही के जरिए बहाल करना पड़ा। निम्न तालिका तीन प्रांतों के जहां अर्द्ध-स्थाई बंदोबस्त किया गया मानक व्यय और मानक राजस्व को दर्शाती हैःµ
प्रांत व्यय राजस्व
राजस्व नियतन योग
सी.पी. 1,76,43,000 1,49,36,000 27,07,000 1,76,43,000
पूर्वी बंगाल 2,12,19,000 2,18,42,000 6,23,000 1,12,19,000 एवं असम
बंगाल 4,72,73,000 4,67,01,000 5,72,000 4,72,73,000
बाद में प्रांत के बंदोबस्त में कुछ संशोधन किए गए ताकि प्रति वर्ष 60,000 रुपए साम्राज्यवादी नियतन से प्रांतीय नियतन में डालकर आबंटन का अनुकूल समायोजन किया जा सके।
अर्द्ध-स्थाई प्रणाली की सीमा से बाहर जो प्रांत था वह सिर्फ बर्मा था। इसका अंतिम पांच वर्षीय बंदोबस्त जो 1902-3 में हुआ था, खत्म हो चुका था। अतएव भारत सरकार ने निश्चय किया कि अन्य प्रांतों से एकरूपता स्थापित करने के लिए पहली अप्रैल, 1907 से इसका अर्द्ध-स्थाई बंदोबस्त किया जाए। निष्पक्ष भावना से इसे राजस्व और व्यय के प्रमुख संयुक्त शीर्षों में बराबर की हिस्सेदारी प्रदान की गई और अन्य प्रांतों की तरह नमक को साम्राज्यवादी अधिकार क्षेत्र में रखा गया। इसे 90,68,000 रुपए वार्षिक का समंजक आबंटन प्रदान किया गया ताकि यह अपने मानक व्यय के घाटे की पूर्ति कर सके और 50,00,000 रुपए का एक प्रारंभिक अनुदान भी दिया गया।