प्रांतीय वित्तव्यवस्था की सीमाएं
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अनुसार एक अच्छी सरकार को उपक्रम करना चाहिए, और इन सेवाओं पर होने वाले व्यय को पूरा करने के लिए पर्याप्त धनराशि जुटाने हेतु करों अथवा ऋण की पद्धति निर्धारित करने की शक्तियां सम्मिलित हैं। इन शक्तियों के साथ-साथ बजट प्रणाली के अन्तर्गत लेखा-जोखा रखना और उसकी स्वतंत्र लेखा-परीक्षा करवाना भी आवश्यक है।
प्रांतीय बजट पर, जिसके उद्गम और विकास पर हमने इस अध्ययन के पूर्ववर्ती भागों में विचार किया है, ये मापदंड लागू करते समय हम बजटों का विश्लेषण करने की उस स्वतंत्रता के लचीलेपन का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते जो स्वतंत्रता का विश्लेषण करते समय ली जाती है। इसके प्रतिकूल भारत के विभिन्न प्रांतों में जो बजट प्रणाली आरंभ की गई उस पर बहुत ही कठोर प्रतिबंध लगाए गए। उन्हें बजट तो दिया गया लेकिन इसके लिए जो अपेक्षित शक्तियां नहीं दी गई। उन्हें लेखा-जोखा रखने तथा लेखा परीक्षा करवाने का बीड़ा भी उठाना पड़ा क्योंकि वे अपने बजट की सीमाओं के भीतर ही स्वतंत्र थे। इस प्रकार के प्रतिबंध क्यों लगाए गए, यह तब स्पष्ट किया जाएगा जब हम प्रांतीय वित्त व्यवस्था के अधि कार क्षेत्र का विस्तार करने के उपायों पर विचार करेंगे। तथापि, इस बात पर बल देना आवश्यक है कि ये प्रतिबंध योजना का एक अभिन्न अंग थे और जैसे-जैसे योजना के अधिकार क्षेत्र और आयाम में विस्तार होता गया वैसे-वैसे ये प्रतिबंध और अधिक कठोर होते गये। वास्तव में उनमें प्रांतीय बजटों की संरचना विधि परिभाषित की गई। अतः ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त व्यवस्था के परिचालन की पूर्ण अवधारणा को जानना सरकार के तत्संबंधी नियमों के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त किए बिना संभव नहीं है। इन नियमों के महत्त्व का इस स्तर पर ही विश्लेषण करना ही लाभदायक होगा। ये नियम, 1870 जब प्रांतीय वित्त व्यवस्था की योजना अस्तित्व में आई थी, और 1912 जब यह योजना विकसित होकर भारत सरकार के वित्त विभाग में संकल्पों के रूप में अपने अंतिम और स्थायी चरण में पहुंच चुकी थी, के बीच अन्तराल के दौरान विभिन्न अवसरों पर बनाए गए थे। 1870 में जो नियम बनाये गये थे बहुत कम और सरल थे। उस समय बनाए जाने वाले बहुत छोटे बजटों के परिचालन के लिए जटिल नियम बनाना आवश्यक भी नहीं था। तत्पश्चात् व्यवस्था और प्रक्रिया के अप्रत्याशित मामलों को निपटाने के लिए अनेक अनुपूरक नियम जारी किए गए लेकिन प्रांतीय सरकार के वित्तीय लेनदेनों के बारे में 1877 ख्1, तक कोई व्यापक नियम तथा विनियम नहीं बनाए गए। 1877 के नियम बाद में जारी किए गए नियमों का आधार थे। ये नियम पंद्रह वर्ष