प्रांतीय वित्तव्यवस्था की सीमाएं
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लेकिन वर्गीकरण का मूलभूत उद्देश्य उन संभावित प्रयोजनों को स्पष्ट करना है जो भारत में विद्यमान प्रांतीय वित्त की ऐसी परस्पर संबंधित योजना के प्रवर्तकों के मन में थे। सिद्धान्तवादी बने बिना यह कहा जा सकता है कि ऐसी योजना के सफल संचालन के लिए प्रांतीय सरकार की (1) प्रशासनिक और (2) वित्तीय शक्तियों को परिभाषित करने के लिए नियम बनाने होंगे। प्रांतीय वित्त के स्वरूप को अच्छी तरह समझने के लिए इन दोनों वर्गों को आगे विभाजित किया जा सकता है। अतः प्रशासनिक शक्तियों संबंधी नियमों को (1) सेवाएं और (2) कर्मचारी उपवर्गों में आगे विभाजित किया जा सकता है। इसी प्रकार वित्तीय शक्तियों संबंधी नियमों को सरलता से निम्नलिखित उप-वर्गों में विभाजित किया जा सकता हैः (1) सामान्य स्वरूप के नियम और (2) प्रांतीय राजस्व, (3) प्रांतीय व्यय, (4) बजट स्वीकृति और (5) लेखा परीक्षा और लेखा संबंधी नियम।
उपरोक्त वर्गों में संभवतया वे सभी उद्देश्य आ जाते हैं जो योजना बनाने वालों के मन में हो सकते थे। इन वर्गों के आधार पर हम अस्पष्ट नियमों को एक संग्रह का रूप दे सकते हैं, आशा है, जो सुविधाजनक और शिक्षाप्रद होगा।
I. प्रशासनिक शक्तियों पर नियंत्रण
(1) अंतर्प्रांतीय सेवाओं के नियम
विभिन्न प्रांतों के लिए पृथक बजटों की स्थापना से प्रभावित अंतर्प्रांतीय अथवा अंतर्विभागीय संबंधों को नियमित करने के लिए यह निश्चय किया गया किµ
(i) किसी अंतर्प्रांतीय समायोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी।
(ii) प्रांतीय सरकारों के नियंत्रण में आए विभाग के व्यय पर अन्य विभागों को
पहले ही किसी सेवा को समाप्त नहीं किया जाएगा और अन्य विभागों के
खर्चे पर इन विभागों को पहले दी जा रही किसी सेवा में वृद्धि नहीं की
जाएगी।
(iii) सीधे संचार की किसी लाइन को छेड़ा नहीं जाएगा अथवा मरम्मत के अभाव
में नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।
(2) कर्मचारी संबंधी नियम
जहां तक प्रांतीयकृत सेवाओं के निष्पादन में लगे कर्मचारियों का संबंध है, प्रांतीय सरकारों को आदेश दिया गया था किµ