प्रांतीय वित्तव्यवस्था की सीमाएं
211
अथवा (ख) भू-राजस्व का आबंटन करना, जब राशि एक वर्ष में 600 रुपये
से अधिक हो या आबंटन इस राशि के भीतर तो हो लेकिन तीन व्यक्तियों
तक सीमित न हो और प्रत्येक उत्तराधिकार पर घटाकर आधा कर दिया
जाए। प्रांतीय सरकारों द्वारा केवल उन्हीं सिविल अधिकारियों को मालगुजारी
(भू-राजस्व) के आबंटन के रूप में अनुदान दिए जाएंगे जिनकी सेवाएं बहुत
विशिष्ट और असाधारण किस्म की रही होंगी। ख्1,
(v) ( क) प्रतिवर्ष 50,000 रुपये से अधिक अतिरिक्त व्यय वाले स्थायी प्रतिष्ठानों
में संशोधन नहीं किया जाएगा, या (ख) सेवा 25,000 रुपये प्रतिवर्ष से
अधिक परिव्यय वाली किसी एक शाखा के मूल वेतन की दरों में संशोधन
नहीं किया जाएगा, या (ग) एक सेवा के औसत वेतन में, जिसका अधि
कतम वेतन 500 रुपये प्रतिमाह से अधिक है, संशोधन नहीं किया जाएगा
और राज्य अथवा भारत सरकार के सचिव द्वारा सेवा के गत संशोधन के
समय अनुमोदित औसत दर से अधिक नहीं बढ़ाएगा, अथवा (घ) निर्वाह
खर्च में वृद्धि या किसी इलाके में किराये में वृद्धि के लिए मुआवजे के रूप
में स्थानीय भत्तों में वृद्धि नहीं की जाएगी। ख्2,
वित्तीय शक्तियों पर नियंत्रण
(1) सामान्य
प्रांतीय सरकारों की वित्तीय शक्तियों पर लगे नियंत्रण का वास्तव में ब्यौरा देने से पूर्व यह स्मरण करना आवश्यक है कि प्रांतों के साथ किए गए वित्तीय समझौतों के अनुसार राजस्व और व्यय के कुछ शीर्ष उन्हें सौंपे जाने थे। इस सांयोगिक लक्षण के आधार पर यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि ये समझौते प्रांतीय बजट में सम्मिलित किये गये राजस्व और व्यय के प्रत्येक शीर्ष से सम्बंधित पृथक समझौतों का एक संग्रह मात्र हैं। प्रांतीय सरकारों द्वारा इस तरह की व्याख्या और उसके परिणामों का निराकरण करने के लिए यह निर्णय दिया गया किµ
(1) प्रांतीय सरकारों को यह समझना होगा कि उन्हें निर्दिष्ट धनराशि उन्हें सौंपी गई
सभी सेवाओं के लिए एक समेकित अनुदान होगा और साम्राज्यिक राजकोष से
इस आधार पर कोई दावा नहीं किया जा सकेगा कि समेकित अनुदान
1912 का नियम 10(9) (क)
1912 का नियम 10(6)