प्रांतीय वित्तव्यवस्था की सीमाएं
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कोई प्रांतीय सरकार अधिक व्यय तभी कर सकती है बशर्ते जितना अधिक व्यय किया जाता है उसे पुनर्विनियोग द्वारा अर्थात् इसके नियंत्रणाधीन किसी अन्य लेखा शीर्ष में स्वीकृत अनुदान में उतनी ही राशि कम कर के प्रतिसंतुलित किया जाए। ख्1, प्रांतीय सरकारों के पास पुनर्विनियोग की व्यापक शक्तियां थी। क्योंकि प्रांतीय सरकार इसके बजट में सम्मिलित प्रांतीय व्यय के निमित्त अनुदानों में पुनर्विनियोग की मंजूरी दे सकती थी चाहे पूर्णतया प्रांतीय शीर्ष हो या विभाजित मुख्य या गौण शीर्ष हो बशर्ते कि कुल प्रांतीय व्यय अनुदान में अधिक हो। ख्2,
(5) लेखा और लेखा परीक्षा नियम
यद्यपि प्रांतों को अपने बजटों में पुनर्विनियोग की काफी शक्तियां दी गई थीं किन्तु उनके लिए यह आवश्यक कर दिया गया था कि वे जो धनराशि खर्च करते हैं उसका लेखा-जोखा रखें और उसकी लेखा-परीक्षा करवाएं। इस सम्बंध में ध्यान देने योग्य महत्त्वपूर्ण यह तथ्य है कि इस प्रकार लेखा-जोखा रखने और उनकी लेखा-परीक्षा करवाने के दायित्व के लिए वे अपने विधानमंडलों के प्रति उत्तरदायी नहीं थे अपितु इसके लिए वे भारत सरकार के प्रति उत्तरदायी थे क्योंकि उनको यह वित्तीय अधि कार भारत सरकार ने दिया था। इसके अलावा, भारत सरकार ने अपने निजी लेखा और लेखा परीक्षा कर्मचारी नियुक्त करके प्रांतों को अपनी स्वेच्छा से इस दायित्व का निर्वाह करने की छूट नहीं दी थी। इसके प्रतिकूल, विभिन्न प्रांतों में तैनात साम्राज्यिक लेखा और लेखा परीक्षा अधिकारियों को इस दायित्व को निभाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी जो प्रशासन तथा उपरोक्त नियमों की व्याख्या के मामले में प्रांतीय सरकारों के आलोचक और मार्गदर्शक का काम करते थे। उनके काम को सुगम बनाने के लिए प्रांतीय सरकारों को हिदायत दी गई थी कि वेµ
(i) लोक लेखाओं ख्3, की प्रक्रिया के प्रपत्र में कोई परिवर्तन न करें अथवा लेखे
का प्रभार दो या अधिक शीर्षों में विभाजित करने का आदेश न दें। ऐसे सभी
मामलों में उन्हें महानियंत्रक, साम्राज्यिक सरकार का एक अधिकारी µ के
निर्णय का पालन करना होगा। ख्4,
(ii) अपने विनियोग अथवा व्यय के सम्बंध में मंजूरी के विरुद्ध साम्राज्यिक लेखा
परीक्षा अधिकारी की आपत्ति प्रांतीय सरकार के स्पष्टीकरण के साथ भारत
सरकार को अंतिम निपटान के लिए प्रेषित करेंगे। ख्5,
1912 का नियम 24
1912 का नियम 25(1)
1897 का नियम 1(क) जैसा कि बाद में संकल्पों में भी शामिल किया गया है।
1897 का नियम 4(2)
1912 का नियम 30 और 31