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प्रांतीय वित्तव्यवस्था का स्वरूप
प्रांतीय वित्तव्यवस्था का अध्ययन तब तक पूर्ण नहीं कहा जा सकता जब तक कि इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं मिलता जो परिणामतः अवश्य ही पूछा जाएगा, कि पुरानी योजना के अन्तर्गत ब्रिटिश भारत में केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय सम्बंध कैसे रहे? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है क्योंकि प्रांतीय वित्तव्यवस्था से सम्बंधित आलोचना और प्रस्तावों तथा इस दृष्टि से किसी विषय की वैधता पूर्णतया इसके स्वरूप को ठीक ढंग से समझने पर निर्भर करती है। दुर्भाग्यवश, इसके महत्त्व को ध्यान में रखते हुए इसकी ओर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना नहीं दिया गया। यही कारण है कि किसी विषय पर विश्वस्त रूप से चर्चा नहीं की गई और फिर भी किसी विषय को इतना गलत नहीं समझा गया जितना कि ब्रिटिश भारत में पुरानी प्रांतीय वित्तव्यवस्था को गलत समझा गया। अतः यह स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है कि ब्रिटिश भारत में स्थापित प्रांतीय वित्तव्यवस्था का वास्तविक स्वरूप क्या था।
राज्यतंत्रों की परस्पर सम्बंधित प्रणाली में, जैसा कि ब्रिटिश भारत में केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के मामले में था, उनके वित्तीय सम्बंधों के वास्तविक स्वरूप को समझना सदैव कठिन होता है क्योंकि ऊपर से जो दिखाई देता है वह वास्तविक से बिल्कुल भिन्न हो सकता है। बहरहाल, आम राय यह थी कि भारतीय प्रणाली प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों के बीच संसाधनों के पृथक्करण पर आधारित थी और प्रांतीय सरकार द्वारा अपनी आय से केन्द्रीय सरकार को अंशदान देने की जो प्रथा थी वह जर्मन साम्राज्य में व्याप्त संघीय वित्त व्यवस्था से प्रायः मिलती-जुलती थी। यह तो नहीं कहा जा सकता कि यह दृष्टिकोण सही था या गलत लेकिन भारत में केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच सम्बंधों के अनेक ऐसे प्रसंग हैं जिनसे निस्संदेह इस दृष्टिकोण को काफी बल मिलता है। ऐसे प्रसंगों में केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच कृत्यों के विभाजन का उल्लेख किया जा सकता है। एक प्रेक्षक ने यह टिप्पणी की कि जहां तक कृत्यों के विभाजन का सम्बंध है, केन्द्रीय सरकार का सैनिक मामलों, विदेशी मामलों, सामान्य कराधान, मुद्रा, ऋण, शुल्कों, डाक और तार,