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प्रांतीय वित्तव्यवस्था का स्वरूप 221

प्रांतों के दावों और उत्तरदायित्वों के द्योतक नहीं हैं। इन आंकड़ों से प्रांतों की वित्तीय स्थिति का पता नहीं चलता। इन आंकड़ों से उन विभिन्न एजेन्सियों के भौगोलिक विभाजन का पता चलता है जिनके माध्यम से भारत सरकार के वित्तीय कारोबार व कार्यकलाप का संचालन होता है और जिनके माध्यम से राजस्व वसूल किये जाते हैं तथा व्यय किया जाता है। उदाहरण के तौर पर ‘‘बंबई’’ शीर्ष के अंतर्गत जो आय और व्यय दिखाया गया है उससे उस आय और व्यय का पता चलता है जो बंबई में तैनात भारत सरकार के महालेखापाल के खातों के माध्यम से होता है और अन्य प्रांतीय सरकारों के शीर्षों के अन्तर्गत दी गई प्रविष्टियों के मामले में भी यही बात सही है। ये आंकड़े वास्तव में भौगोलिक दृष्टि से विभाजित भारत सरकार के लेनदेन के द्योतक हैं और इन में प्रांतीय नाम की कोई चीज नहीं है। तथापि ऐसी लेखा प्रणाली से यह धारणा बनती है कि भारत में वित्तव्यवस्था मुख्य रूप से संघीय है।

इन तीन प्रसंगों के आधार पर ब्रिटिश भारत में केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय सम्बंधों को संघीय वित्तव्यवस्था की संज्ञा देना सरल था। भारतीय अर्थव्यवस्था के साधनों के पृथक्करण तथा उपज (आय) से अंशदान पर आधारित होने का विचार इतना गहरा था कि भारतीय व्यय (1892) और ब्रिटिश भारत में विकेन्द्रीयकरण (1909) सम्बंधी रॉयल आयोगों के समक्ष साक्ष्य देते हुए अनेक साक्षी आयुक्तों पर आक्रमण करने के लिए टूट पड़े और उन्होंने अर्थव्यवस्था के अनौचित्य की आलोचना की तथा न्याय के हित में इसमें संशोधन करने के सुझाव दिये। उन्होंने अपनी ऐसी मान्यताओं के स्पष्ट शब्दों में कहीं कोई कारण नहीं बताए हैं। ख्1, यद्यपि उनके सुझाव इस बात का सुस्पष्ट प्रमाण हैं कि उनकी ऐसी धारणा थी। जब तक वे यह नहीं मानते कि प्रांतों का राजस्व तथा सेवाएं पृथक हैं तो केन्द्रीय सरकार की सहायता के लिए विभिन्न प्रांतों द्वारा अपने राजस्व से असमान अंशदान किये जाने के कारण उनके साथ जो अन्याय हुआ उसे दूर कराने के प्रयासों में अपनी शक्ति बर्बाद करने की उनसे आशा नहीं की जा सकती थी।

यदि केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय सम्बंधों के बारे में उनका दृष्टिकोण स्वीकार्य होता तो उनकी आलोचना तथा उनके सुझाव काफी हद तक स्वीकार कर लिये गये होते। विभिन्न प्रांतों द्वारा अपने राजस्व अथवा आबादी के अनुपात में जो भी अंशदान दिये जाते थे वे ऐसी कुछ आपत्तिजनक किन्तु सामान्यतया स्वीकृत परिकल्पना के आधार पर निश्चित रूप से असमान थे कि एक प्रांत में एकत्र किया गया पूरा राजस्व उसी प्रांत का होता है।

  1. सी. एफ. भारतीय व्यय आयोग कार्यवाही वृत्तान्त का साक्ष्य, खण्ड 3 सन्दर्भ-क्यू. 18094 और विकेन्द्रीयकरण

आयोग साक्ष्य, खंड 2, क्यू. 9497