8 प्रांतीय वित्त व्यवस्था का स्वरूप - Page 239

224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सरकारों का भी, जिनको अधिक जानकारी होनी चाहिए, विचार था और उनका यह तर्क था कि राजस्व में प्रांतीयकरण के नाम पर भारत सरकार ने उन्हें जो कुछ दिया है वह केवल भोगाधिकार नहीं है अपितु राजस्व पर अधिकार है। परन्तु भारत सरकार सदैव ऐसे दावों को दबाने में तत्पर रहती थी। यह स्पष्ट है कि प्रांतीय समझौतों को हर पांच वर्षों में संशोधित किया जा सकता था, भोगाधिकार चिरस्थायी नहीं था और भारत सरकार यदि चाहे तो पांच वर्षों के अन्त में इसे पुनः वापस ले सकती थी। यह बात 14 जनवरी, 1882 के पत्र संख्या 284 में बंगाल सरकार द्वारा किये गये दावों के उत्तर से बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है जिससे निम्नलिखित उद्धरण दिया जाता हैःµ

‘‘मतभेद दूर करने तथा अन्य सुविदित उद्देश्यों को, जिनका उल्लेख करना

आवश्यक नहीं है, ध्यान में रखते हुए साम्राज्यिक सरकार ने प्रशासन का कुछ

काम स्थानीय सरकारों को सौंप दिया। स्थूल अनुमान यह है कि सामान्य आय

का एक अंश तथा उसमें होने वाली वृद्धि, जो इसके अपने नियंत्रण में रहेगी,

व्यय को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा। केन्द्रीय सरकार, आय का बाकी अंश

स्थानीय सरकारों को दे देगी जिससे वे कुछ आवश्यक व्यय पूरा करेंगी। लेकिन

यह जरूरी नहीं है कि केन्द्रीय सरकार यह राशि हमेशा देती रहेगी क्योंकि यह

अनुमान अनिवार्य रूप से एक मोटा अनुमान है और अप्रत्याशित रूप से संसाध

नों में कमी होने अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा अपने पास रखे गये या प्रांतों को

सौंपे गए वित्तीय प्रशासन पर व्यय बढ़ जाने से इसमें फेरबदल किया जा सकता

है। विनियोग की जांच करने पर आवश्यक हुआ तो इसमें पुनः समायोजन किया

जा सकता है। इस पर अधिकार का त्याग इसके स्वरूप और बंगाल के स्थायी

समझौते के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।’’

यद्यपि प्रांतों के लिए चिन्ता व्यक्त की गई, तथापि, संशोधन मुख्य रूप से साम्राज्यिक सरकार के हितों को ध्यान में रखते हुए किए गए जैसा कि विनियोग पुनः आरम्भ करने से अकाट्य रूप से सिद्ध होता है। स्थायी समझौते में इसलिए विलम्ब किया गया था कि भारत सरकार अपने राजस्व पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ना चाहती थी। पंचवर्षीय समझौते के अन्तर्गत भोगाधिकार का बिना किसी बाधा के केवल पांच वर्षों के लिए प्रयोग करने की अनुमति दी गई थी। लेकिन यह समर्पण अस्थायी था और केवल पांच वर्षों के लिए होते हुए भी राज्य ख्1, के सचिव के अनुसार बहुत ही अविवेकपूर्ण था। यह बात इस तथ्य से सिद्ध हो जाती है कि

  1. भारत सरकार को भेजा गया दिनांक 16 फरवरी, 1882 का पत्र संख्या 51 और दिनांक 6 जुलाई, 1882

का पत्र संख्या 208