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प्रांतीय वित्तव्यवस्था का स्वरूप

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भारत सरकार ने कभी भी अपने राजस्व के भोगाधिकार का प्रयोग करने का अधि कार वापस नहीं लिया जैसा कि केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रांतीय अधिशेषों पर लगाए गए असाधारण शुल्कों अथवा दातव्य शुल्कों से, जैसा कि उन्हें पुकारा जाता था, पता चलता है। स्थायी समझौते का भी यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि विभिन्न प्रांतों को दिये गए राजस्व कानूनी तौर पर उनके राजस्व हो गये क्योंकि कानून की नजर में प्रांतीयकृत राजस्व समेत सभी राजस्व अभी भी भारत सरकार के अधिकार में थे। भारत के राजस्व पर अपना अधिकार प्रांतों को हस्तांतरित करके भारत सरकार कानूनी तौर पर प्रांतों को राजस्व सौंप सकती थी, इसमें संदेह है। संसदीय कानून के आधार पर भारत का राजस्व भारत सरकार को सौंपा गया था, और इसी संसदीय कानून के एक खंड द्वारा भारत सरकार की विधायी शक्तियों को सीमित कर दिया गया था। इस खंड के अन्तर्गत भारत सरकार पर ‘‘ऐसे कानून या विनियम बनाने पर रोक लगा दी गई थी जिनके द्वारा (1833) के इस अधिनियम के किसी प्रावधान का अथवा सम्राट के विशेषाधिकार या संसद के प्राधिकार का किसी तरह निरसन किया जा सके, उसमें परिवर्तन किया जा सके, उसे निलम्बित या प्रभावित किया जा सके।’’

यह महत्त्वपूर्ण है कि ऐसा करने के लिए संसद के अधिनियम की आवश्यकता पड़ी। लेकिन भारत सरकार ने राजस्व पर अधिकार का कोई कानूनी परित्याग नहीं किया और यदि भारत सरकार ने ऐसा किया होता तो वह अपना कानून बना कर इसे समाप्त भी कर सकती थी। यह भी नहीं कहा जा सकता कि प्रांतीय राजस्व की अलग व्यवस्था करने से प्रांतों के पास अलग राजस्व आ गया। प्रांतीय सरकारों को प्रांतीयकृत राजस्व से होने वाली वसूली को रखने के लिए अपने निजी राजकोष स्थापित करने की अनुमति दी गई होती तो पृथक स्वामित्व की दृष्टि से प्रांतीय राजस्व का कोई अर्थ होता। लेकिन नियमों के अनुसार प्रांतीय सरकारों को अपनी धनराशि कहीं और जमा न करके साम्राज्यिक सरकार के राजकोष में ही जमा करनी होती थी। इसके परिणामस्वरूप राजस्व का स्वामित्व भारत सरकार के हाथों में ही रहा और साम्राज्यिक राजकोष से प्रांतीय राजस्व के वितरण का काम साम्राज्यिक सरकार के अधिकारियों द्वारा किया जाता था। बहरहाल इस दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं आया। लेकिन ऐसा गलत दृष्टिकोण माननीय श्री सयानी से अधिक विश्वस्त ढंग से किसी ने कभी बयान नहीं किया है और सर जेम्स वैस्टलैण्ड से अधिक जोरदार ढंग से किसी ने इसका खंडन नहीं किया। ऐसा भारत सरकार के काउंसिल हाल में बजट पर वाद-विवाद के अवसर पर दोनों में बहस के दौरान हुआ जिससे निम्नलिखित उद्धरण प्रस्तुत किया जाता हैःµ