8 प्रांतीय वित्त व्यवस्था का स्वरूप - Page 241

226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय श्री सयानी ने कहाःµ

‘‘प्रांतीय वित्तव्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि देश का राजस्व प्रांतों के जो

इसे एकत्र करते हैं स्वामित्व में होने के बजाय या उनकी अपनी आवश्यकताओं

के लिए उपलब्ध होने के बजाय एक सामान्य निधि बन जाता है जिसका प्रयोग

केवल केन्द्रीय सरकार ही कर सकती है और केन्द्रीय सरकार इसमें से जितनी

राशि देना चाहे प्रांतीय सेवाओं के लिए दे सकती है।’’

इस टिप्पणी के निन्दात्मक भाव को समझते हुए वित्तमंत्री सर जेम्स वैस्टलैण्ड ने खड़े होकर यह कहाःµ

‘‘यदि मैं माननीय श्री सयानी की बात ठीक से समझता हूं तो उन्होंने कहा कि

भारत सरकार ने जो व्यवस्था की है वह इस सिद्धांत पर आधारित है कि विभिन्न

प्रांतों के अलग-अलग राजस्व नहीं हैं और प्रांत उन्हें खर्च नहीं कर सकते।

विभिन्न प्रकार के राजस्व एक सामान्य निधि के अन्तर्गत आते हैं और स्थानीय

सरकारें उनकी वसूली करने के लिए भारत सरकार की एजेंट ही हैं। मैं समझता

हूं, उन्होंने इस तरह के कुछ शब्दों में सिद्धान्त की निंदा करने के प्रयोजनार्थ

इस सिद्धान्त का उल्लेख किया। खैर! मैं इस सिद्धान्त का पूरा समर्थन करता

हूं। राजस्व पर भारत सरकार का स्वामित्व है, यह उसकी संवैधानिक सम्पत्ति

है। भारत सरकार एक संस्था है जिसका सृजन संसद के अधिनियम द्वारा किया

गया है और यदि संसद के उस अधिनियम का उल्लेख किया जाए तो स्पष्ट हो

जाएगा कि भारत के राजस्व पर भारत सरकार तथा केवल उस सरकार का ही

अधिकार है। उनके सम्बंध में स्थानीय सरकार जो भी काम करती है वह भारत

सरकार के विशिष्ट आदेश के अनुसार न्यायसंगत होना चाहिए। स्थानीय सरकारों

के पास जो शक्तियां हैं उन्हें भारत सरकार ही देती है, इसके अलावा वे किसी

वित्तीय शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकती।’’ ख्1,

इसके अतिरिक्त यदि भारत में केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय सम्बंध साधनों के विभाजन और प्रांतों की आय से अंशदान सिद्धांत पर आधारित होते तो प्रांतीय सरकारों द्वारा जिन सेवाओं का संचालन किया जाता है उनके लिए कानूनी जिम्मेदारी प्रांतीय सरकारों की ही होनी चाहिए थी। यह सही है कि अधिकांश संघीय देशों में केन्द्रीय और राज्य सरकारों के बीच कृत्यों के विभाजन की तरह भारत में भी केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच कृत्यों का विभाजन किया गया था। तथापि, याद रहे कि कृत्यों का यह विभाजन कानूनी नहीं था

  1. वित्तीय विवरण, 1897-8, पृष्ठ 110