232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाता था अपितु प्रत्येक विभाग की इसकी आवश्यकताओं के अनुसार सिद्धांत के आधार पर किया जाता था। अतः किसी अन्य सिद्धांत के आधार पर इस व्यवस्था की निष्पक्षता की आलोचना करना बेकार है।
इस प्रकार व्याख्या करने पर कहा जा सकता है कि प्रांतीय वित्तव्यवस्था विभागीय वित्तव्यवस्था जैसी थी जो विकेन्द्रीयकृत वित्तव्यवस्था अथवा संघीय वित्तव्यवस्था से बिल्कुल भिन्न थी। मामले के तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह विचार सही विचार है। विभागीय वित्त व्यवस्था में राज्य के प्रत्येक विभाग के लिए बजट में कुछ अनुदान विभाग अनुदान की राशि के बराबर राजकोष से राशि निकाल सकता है। इसी प्रकार प्रांतीय सरकारें जिन विभागों का संचालन करती हैं उनके लिए उन्हें कुछ समेकित अनुदान निर्धारित किया जाता है और तत्पश्चात् दिया जाता है। उन विभागों पर होने वाले व्यय को पूरा करने के लिए प्रांतीय सरकारें अनुदान की राशि के बराबर साम्राज्यिक राजकोष से धनराशि निकालती हैं। प्रांतीय वित्तव्यवस्था होते हुए भी इसमें प्रांतीय नाम की कोई चीज नहीं है। 1870 के पश्चात् भी, जब प्रांतीय वित्तव्यवस्था अस्तित्व में आई, राजस्व सेवा में, सिविल सेवाएं उतनी ही निश्चित रूप से साम्राज्यिक थी जितनी कि वे 1870 से पूर्व थीं जब प्रांतीय वित्त-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं थी। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि प्रांतीय वित्तव्यवस्था एक स्वतंत्र वित्तवयवस्था नहीं थी और न ही इसमें कर लगाने तथा पैसा खर्च करने की स्वतंत्रता थी। यह केवल लेखे रखने की एक व्यवस्था थी जिसमें धन भारत सरकार की अनुमति से ही निकाला और जमा किया जा सकता था।
इसका अर्थ यह हुआ कि प्रांतीय वित्तव्यवस्था की योजना आरम्भ करने के पश्चात् भी केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच वित्तीय सम्बंधों के स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आया। स्रोतों के संकलन और आय के वितरण की व्यवस्था कोई नई बात नहीं थी बल्कि यह 1833 से चली आ रही थी। यह उस समय स्थापित साम्राज्यिक व्यवस्था का वित्तीय प्रतिरूप थी। यह इसलिए था क्योंकि प्रांतीय वित्तव्यवस्था होने के बावजूद प्रांतीय सरकारों के सम्बंधों में कोई परिवर्तन नहीं आया और वे अलग शक्तियां होने के बजाए पहले की भांति भारत सरकार के विभाग बनी रहीं। ऐसी निष्कर्ष को कुछ आश्चर्यजनक माना जाना अवश्यंभावी है। लेकिन यह निःसंदेह सही है और ब्रिटिश भारत में प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों के बीच कानूनी सम्बंधों को ध्यान में रखते हुए कोई अन्य निष्कर्ष सम्भव नहीं है। लेकिन यदि प्रांतीय अर्थव्यवस्था का अर्थ लेखा-जोखा ही रखना है तो क्या इसके परिणामस्वरूप साम्राज्यिक व्यवस्था के वित्तीय संगठन में कोई परिवर्तन नहीं हुए? इस बात से इंकार करना उचित नहीं होगा कि प्रांतीय वित्तव्यवस्था की योजना आरम्भ करने के कारण साम्राज्यिक व्यवस्था के वित्तीय