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प्रांतीय वित्तव्यवस्था का स्वरूप

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संगठन में कोई परिवर्तन हुआ, और यह कहना भी समान रूप से निरर्थक होगा कि इसके परिणामस्वरूप कोई मूलभूत परिवर्तन हुआ। तथ्य यह है कि प्रांतीय वित्तव्यवस्था आरम्भ करने के परिणामस्वरूप केवल दो उल्लेखनीय परिवर्तन हुएःµ

(1) 1870 से पूर्व सभी सेवाओं की बकाया राशि वित्तीय वर्ष के अन्त में

भारत सरकार के पास चली जाती थी। 1870 के पश्चात् प्रांतीय सरकार

को विभिन्न सेवाओं के लिए दी गई राशि में से खर्च न की गई बकाया

राशि प्रांतीय सरकारों के पास रहती थी और आगामी वर्ष के लिए उनके

संसाधनों का अंग बन जाती थी।

(2) 1870 से पूर्व सभी सेवाओं से संबंधित बजट प्राक्कलनों की मंजूरी

भारत सरकार से लेनी होती थी और प्रांत भारत सरकार से पहले मंजूरी

लिये बिना आवश्यक होने पर भी उस वर्ष के विभिन्न अनुदानों में

कोई पुनर्विनियोग नहीं कर सकते थे। 1870 के पश्चात् प्रांतों की प्रबंध

व्यवस्था चलाने के लिए दी गई विभिन्न सेवाओं पर अपनी इच्छानुसार

किसी तरीके से धन खर्च करने की प्रांतों को अधिक स्वतंत्रता मिल

गई लेकिन शर्त यह थी कि उनका कुल व्यय साम्राज्यिक राजकोष में

उनके नाम जमा धनराशि से अधिक नहीं होना चाहिए। ख्1, लेकिन नियमों

के अनुसार उनके लिये सभी सेवाओं को सुचारू रूप से चलाना आवश्यक

था। इसी प्रकार 1870 के पश्चात् सरकारों को अनुदानों में पुनर्विनियोग

करने की भी पूरी छूट मिल गई जबकि पहले वे ऐसा नहीं कर सकती

  1. इसमें संदेह है कि प्रांतीय सरकारें विभिन्न सेवाओं के लिए प्राप्त अनुदानों के वितरण में कोई बड़ा

परिवर्तन कर सकती थीं। मद्रास के राज्यपाल, स्वर्गीय लार्ड होबर्ट इस प्रस्ताव पर कि प्रांतीय निधियों से

सड़कों के लिए दिया गया अनुदान बन्द कर दिया जाए और यह राशि शिक्षा पर खर्च की जाए। राज्य

सचिव ने राजस्व विभाग के दिनांक 10 दिसम्बर, 1874 के पत्र संख्या 30 में यह कहा कि ‘‘मैं नहीं

समझता कि ऐसा करना राजस्व के तथाकथित प्रांतीय प्रशासन के सिद्धांतों के अनुरूप होगा। वास्तव

में मैं इस पक्ष में नहीं हूं कि व्यवस्था आरम्भ करने के समय विभिन्न सेवाओं का जो अनुपात था उन

पर सदैव उसी अनुपात में व्यय किया जाए। तथापि मैं श्री सिम की इस बात से सहमत हूं कि निहित

अर्थों में यह वायदा किया गया था कि सभी विभागों को पूरी तरह सुचारु रूप से तथा सत्यनिष्ठा से

बनाए रखा जाएगा और किसी विभाग को पूरी तरह बलि का बकरा बनाकर दूसरे किसी विभाग या

विभागों को लाभ नहीं पहुंचाया जाएगा। विचाराधीन नई वित्तव्यवस्था पर दोनों विभिन्न भारतीय सरकारों

तथा स्वदेशी (होम गवर्नमैंट) सरकार द्वारा उस समय पूरी तरह चर्चा की गई थी। इस चर्चा के दौरान

यह सुझाव कभी नहीं दिया गया कि ऐसा परिवर्तन भी किया जा सकता है कि भारत के कुछ भागों

में उसके परिणामस्वरूप सड़कों का निर्माण बन्द हो सकता है। यदि ऐसी संभावना होती तो मुझे संदेह

है कि ऐसा परिवर्तन किया गया होता।