ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 11
भारत में स्थानीय प्रशासन शैली निम्न प्रकार थीµ
देश को तीन प्रेसीडेंसियों में विभाजित किया गया था। यथा बंगाल, मद्रास और बंबई जिनकी क्रमशः राजधानियां थींः फोर्ट विलियम, फोर्ट सेंट जार्ज और बंबई स्वयमेव।
प्रारंभ में भारत में सर्वोच्च स्थानीय प्रशासन इन तीन सरकारों में विभाजित किया गया था, प्रत्येक की हैसियत समान थी। केन्द्रीकरण की दृष्टि से भारत का सर्वोच्च प्रशासन तंत्र फोर्ट विलियम, बंगाल के गवर्नर के अधीन था। अन्य दो गवर्नर बंगाल के गवर्नर के अधीन थे जिसे भारत के गवर्नर जनरल की पदवी दी गई थी।
गवर्नर जनरल की नियुक्ति क्राउन (सम्राट) के अनुमोदन से निदेशक मंडल (कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स) द्वारा की जाती थी। गवर्नर जनरल की सहायता एक परिषद् करती थी, जिसे सर्वोच्च परिषद् (सुप्रीम काउंसिल) कहा जाता था। मूलतः इसमें चार सदस्य होते थे, जिनमें से तीन को आवश्यक रूप से दस वर्ष तक भारत में कंपनी के सेवक के रूप में काम करना अनिवार्य था। चौथे व्यक्ति को कंपनी की सेवा से संबंधित होना आवश्यक नहीं था। भारत में सेना का प्रधान सेनापति (कमांडर-इन-चीफ) गवर्नर जनरल के कार्यालय का पदेन सदस्य होता था। पांच सदस्यों की इस सर्वोच्च परिषद् का विस्तार 1853 में छः विधायी सदस्यों को सम्मिलित कर किया गया जिन्हें परिषद् में उपस्थित होने और विधि एवं विनियमों की संरचना के बारे में अपना मत व्यक्त करने का ही अधिकार था। उन छः विधायी सदस्यों में से चार सदस्यों को कंपनी की सेवा में बंबई, मद्रास, बंगाल तथा उत्तर पश्चिमी प्रांतों में दस वर्ष तक असैनिक कर्मचारी (सिविल सर्वेन्ट) के रूप में कार्य करना अनिवार्य होता था। शेष दो स्थानों पर कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा एक अन्य न्यायाधीश नियुक्त किए जाते थे। गवर्नर जनरल को विक्टोरिया चेप्टर 95 की संविधि 16 और 17 की धारा 22 के अधीन ग्यारह सदस्यों की इस परिषद् में दो और सदस्य सम्मिलित करने का अधिकार प्राप्त था। लेकिन 1857 के विद्रोह के समय तक उस अधिकार का प्रयोग नहीं किया गया।
इस प्रकार गवर्नर जनरल तथा प्रधान सेनापति सहित भारत की सर्वोच्च परिषद् में छः सदस्य होते थे जिनसे कार्यपालिका सरकार का उद्देश्य सिद्ध होता था और बारह सदस्यों से विधायिका (विधान-मंडल) का उद्देश्य पूरा होता था, सात सदस्यों से पर्याप्त गणपूर्ति (कोरम) हो जाती थी।
गवर्नर जनरल की शक्तियां इतनी अधिक थीं कि वह लगभग तानाशाह था। वह न केवल परिषद् में समस्त विधि निर्माण के लिए वीटो (निषेधाधिकार) का प्रयोग कर सकता था बल्कि परिषद् का स्वतंत्र रूप से संचालन और कार्यवहन भी कर