प्रांतीय वित्तव्यवस्था का विस्तार
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गया तथा भारत सरकार के लिए इसके संदर्भ की आवश्यकता नहीं थी सिवाए इसके कि उसे सूचित करना था कि यह अनुमान उन राजस्व की सीमाओं में निहित हैं जो प्रांत को सौंपे गए हैं। इसलिए यह स्पष्ट है कि कोई भी संवैधानिक आपत्ति नहीं थी ताकि लेखाओं के पृथक्करण के लिए मांग को स्वीकृति दी जाए।
चौथी सिफारिश उसी वर्ग की थी जैसी कि तीसरी सिफारिश थी और इसमें भी यह नहीं कहा जा सका कि भारत सरकार द्वारा निर्धारित संवैधानिक उत्तरदायित्वों का कोई उल्लंघन निहित है। राजस्व के अलग-अलग शीर्षों के उन्मूलन से स्पष्टतया प्रांतों द्वारा बजट अनुमानों की तैयारी में भारत सरकार का हस्तक्षेप स्पष्टतया कम हो गया। इसी प्रकार व्यय के अलग-अलग शीर्षों के उन्मूलन से प्रांतों को सौंपे गए राजस्व को व्यय करने के मामले में अधिक स्वतंत्रता ख्1, प्रदान की गई। उस पद्धति के अंतर्गत प्रांतीय सरकार किसी विशेष सेवा पर अधिक व्यय नहीं कर सकती थी यदि वह अलग-अलग शीर्ष के अंतर्गत थी जब तक कि भारत सरकार उस सेवा के अधीन व्यय के आंकड़ों को बढ़ाने के लिए अपनी अनुमति न देती। यदि भारत सरकार ने अपने आंकड़ों को कम कर दिया तो प्रांतीय सरकार बलात अपने ही आंकड़ों को कम करने के लिए बाध्य थी। अलग-अलग शीर्षों की पद्धति के लिए उत्पत्ति से स्रोतों और योगदान के पृथक्करण की पद्धति के स्थानापन्न से स्पष्टतया प्रांतीय सरकारों को अधिक स्वाधीनता प्राप्त हुई जिसमें भारत सरकार का कोई दुष्परिणाम नहीं हुआ। भारत सरकार ने उस मांग का विरोध करने के लिए जो आपत्तियां कीं वे आश्वस्त करने से कहीं अलग थीं। इस बात पर जोर ख्2, दिया गया था कि प्रांतीय सरकारें पूर्ण पृथक्करण के लिए ऐसी रुचि नहीं ले सकती हैं जैसी कि उन्होंने उन राजस्वों के संबंध में रुचि ली थी जिन्हें अलग-अलग किया गया था परन्तु स्पष्टतया यह गलत विचार है कि प्रांतीय सरकार पर यह विश्वास नहीं किया गया कि किसी कर का दक्षतापूर्वक संचालन किया जाए जब तक कि उसके परिणाम में वित्तीय रुचि न हो। उस विचार से यह अनुमान लगाया गया कि राजस्व के एकत्र करने में व्यस्त लोग वस्तुतः यह जानते थे कि क्या यह साम्राज्यवादी अथवा प्रांतीय साख है। वास्तव में अंतिम साख किसी भी प्रकार राजस्व के संग्रह को प्रभावित नहीं कर सकी। और यदि यह विचार सत्य भी होता तो प्रत्येक सरकार उस कठिनाई को आसानी से सुलझा लेती जिनके पास अपने ही राजस्व एकत्र करने के लिए अपने कर्मचारी थे। किसी प्रकार द्वारा अपने कार्यों को संपन्न करने कराने के लिए किन्हीं अन्य एजेंसियों को काम पर लगाना स्पष्टतया जटिल और बेतुकी पद्धति है जैसी कि भारत में स्थिति रही है। यदि एजेंसियों का अलग-अलग होना स्रोतों के अलग-अलग होने का परिणाम था
आर.सी.डी., मिट. ऑफ एविड, खंड 8, क्यू. 35225-28
वही, खंड 4, क्यू. 15100, 16791