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246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तो यह स्थिति सभी अच्छाइयों के लिए सुधारवादी सिद्ध हुई होती। इसके अलावा इस बात की अपेक्षा की गई जिसने प्रांतीय सरकारों को अलग-अलग मदों द्वारा वैयक्तिक रुचि प्रदान की और वस्तुतः यह बात इसके पक्ष में न होकर इस पद्धति के विरुद्ध थी। यह एक ऐसी पद्धति थी जिसने सार्वजनिक हित से अलग राजस्व के निहित स्वार्थ को जन्म दिया और यह पद्धति ठीक नहीं थी। क्योंकि इस हित में से निश्चय ही इसकी वसूली ख्1, में कठोरता और सख्ती की ओर उन्मुख होना था। इस उदाहरण के रूप में इसे कराधान प्रेषण के मामले में प्रांतीय सरकारों की कुख्यात अनिच्छा बताई जा सकती है। ख्2, यदि प्रांतीय सरकारों के मानवीयकरण का वांछनीय लक्ष्य था जो अलग-अलग मदों का उन्मूलन एक अच्छा उपाय था। एक अन्य आपत्ति थी जिसका भारत सरकार ने विरोध किया कि इस प्रकार के परिवर्तन से भारत सरकार को प्रांतीय सरकारों द्वारा वसूल किए गए राजस्व से खिराज (शुल्क) का अंशदान प्राप्त होगा और भारत सरकार प्रांतीय सरकारों के पेंशनर के रूप में दिखेगी तथा भारत सरकार उनका नियंत्रण करने की अपेक्षा उनके अधीन निर्भर दिखाई देगी। इस आपत्ति को भावुकता के रूप में होने के कारण हटा देना चाहिए।

प्रांतीय वित्त व्यवस्था के विस्तार के लिए पांचवां और अंतिम सुझाव भारत सरकार के दायित्व के लिए सब से कम अप्रिय था। इसका कोई कारण नहीं है कि प्रांतीय और केन्द्रीय दोनों सरकारों के लिए एकल खजाना पद्धति क्यों होनी चाहिए। यह सत्य है कि सामान्य खजाना देश की रोकड़ बचतों के लिए अर्थव्यवस्था की उच्च स्थिति पैदा करता है और उसे प्रभावी बनाना प्रत्येक सरकार का कर्तव्य है, जैसा कि कोई व्यापारिक फर्म अपने धन अथवा लगाई गई पूंजी में मितव्ययता करते रहने का अपना कर्तव्य समझती है। परन्तु यदि सामान्य से शेष राशियों के उपयोग में बाधा पड़ती है तो उन रोकड़ शेषों में वृद्धि द्वारा निहित हानि की क्षतिपूर्ति की अपेक्षा स्वतंत्र रूप से अधिक लाभ होगा जो अलग-अलग खजानों और अलग-अलग उपायों तथा साध नों की स्थापना का अनुसरण करेगा परन्तु प्रांतीय सरकारों की मांग ने अलग-अलग

खजाना पद्धति तथा अलग-अलग उपायों और साधनों में निहित केन्द्रीय सरकार की शेष राशियों से प्रांतीय शेष राशियों को पूर्णतया अलग होने के लिए नहीं कहा। जिसका कारण शायद यह था कि उन्होंने यह पूर्वाभास किया कि इस प्रकार के प्रस्ताव का अर्थ यह था कि यदि प्रांतीय राजस्व का अलग-अलग स्वत्वाधिकार होता तो भारत सरकार को ऐसी मांग के लिए संवैधानिक आपत्ति होती। उन सभी ने ऐसी शक्ति की मांग की कि उन्हें भारत सरकार को बिना बताए एक निश्चित राशि तक अपनी शेष राशियों के कुछ भाग को व्यय करने का अधिकार होना चाहिए। यह सुझाव

  1. इस संबंध में देखिए द फ्री सिस्टम - प्रोफेसर उरधाल।

  2. आर. सी. डी., मिट. ऑफ एविड, खंड 10, क्यू. 44866