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प्रांतीय वित्तव्यवस्था का विस्तार

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‘‘उचित सुझाव’’ के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ख्1, क्योंकि इसके परिणाम उचित ही होंगे। किन्तु शर्त यह थी कि यह राशि अधिक नहीं होनी चाहिए तथा इसके परिणाम भारत सरकार को अपने नियंत्रण के अधिकार से वंचित न करें अथवा उपायों और साधनों में किसी प्रकार की बाधा न डालें परन्तु इससे देश के रोकड़ शेष में कुछ ही वृद्धि होगी।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रांतीय वित्त व्यवस्था का विस्तार भारत सरकार के संवैधानिक उत्तरदायित्वों की व्याख्या के अति संकीर्ण और अति विधिक रूप से अनुचित ढंग से प्रतिबंधित था। प्रांतीय सरकारों द्वारा दिए गए सुझावों के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि भारत सरकार की संवैधानिक स्थिति में उल्लंघन किए बिना यह संभव होगा कि ऐसे परिवर्तन प्रभावी होंगे जिन्हें वे चाहते थे तथा इसके साथ उनके उत्तरदायित्व की भावना में अधिक उदार दृष्टिकोण होगा। इस प्रकार की रियायतों ने प्रांतीय वित्त को आत्मनिर्भर तथा स्वायत्त बना दिया जैसा कि वह इस योग्य था। निःसंदेह यह पद्धति विशुद्ध परिपाटी पर ही निर्भर न थी, इसके लाभ भी उतने ही वास्तविक थे मानों वे विधि पर आधारित हों।

परन्तु ऐसा समय आ गया जब वित्तीय साधन एक ऐसे रूप में नहीं देखे गए जिनका संबंध केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों से था। एक तीसरा पक्ष उभरा जिनके सलाहकार 1870 में अमान्य माने गए परन्तु उन्होंने देश के वित्तीय संसाधनों की प्रकृति में अपनी आवाज उठाने पर बल दिया। वह भारतीय करदाता ही था तथा उसका विरोध इतना बढ़ गया था कि उसने शक्तियों को बाध्य कर दिया कि वे इस पद्धति को बदल लें ताकि उसे इस बात की अनुमति मिल जाए कि वह उस स्थिति में भूमिका निभा सकता था जो वह भूमिका निभाना चाहता था।

इस घटना के अनुसरण में जो परिवर्तन हुए हैं, उनका वर्णन भाग चार में किया गया है।

  1. आर.सी.डी., मिट. ऑफ एविड, खंड 10, क्यू. 44900