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252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विद्यमान उनकी सरकारी पद्धति को नवीन अथवा परिवर्तित रूप देने की आवश्यकता हुई।

यदि यह तथ्य है कि कार्यपालिका विधायिका के अंग के रूप में संसदीय शासन प्रणाली की सरकार का पर्याप्त संकेत है तो 1853 से भारत सरकार की पद्धति को संसदीय शासन प्रणाली वाली सरकार कहा जा सकता है। वास्तव में भारतीय संविधान के इस लक्षण को नकारना शायद ही संभव हो क्योंकि संवैधानिक विधि के उपबंध उस समय से ऐसे रहे हैं कि अतिरिक्त (अर्थात् विधायिका) सदस्य और साधारण (अर्थात् कार्यपालिका) सदस्य परस्पर मिलकर ब्रिटिश भारत में शांति, व्यवस्था और अच्छी सरकार के लिए कानून और विनिमय बनाने हेतु विधान-मंडल बनाएंगे। ख्1, परन्तु वास्तविक परिणामों की दृष्टि से जांच की जाए तो भारतीय पद्धति सरकारी पद्धतियों के उस वर्ग की विधिसम्मत संकल्पना से दुखद रूप से नीचे गिर जाती है जिसका उससे संबंध था। यदि अन्य देशों में संसदीय शासन प्रणाली की सरकार का रिकार्ड देखा जाए तो ज्ञात होगा कि कार्यपालिका को विधायिका के समक्ष झुकना है जिस भारत में कार्यपालिका का काम बाधा डालना रहा अथवा प्रायः विधायिका की अवज्ञा करना रहा। किसी व्यक्ति की यह खोज व्यर्थ ही हो सकती है यदि विधायिका की कार्यवाही की जांच की जाए कि कार्यपालिका ने लोगों की इच्छाओं का सम्मान किया है। ख्2, इस क्षेत्र में अनवरत सुधार किए जाते रहे, विधायिका ने सुधार किए लेकिन कार्यपालिका ने उतनी ही दृढ़ता से उन्हें नकार दिया।

विधान परिषद् प्रस्तुत किए वापस लिए रद्द किए स्वीकृत

गए संकल्पों गए संकल्पों गए संकल्पों संकल्पों

की संख्या की संख्या की संख्या की संख्या उच्चतम 3 2 1 0 मद्रास 32 26 6 0 बंगाल 38 26 12 0 यू.पी. 22 10 12 0 बिहार और 5 5 0 0 उड़ीसा

सी.पी. (मध्य भारत) 4 2 2 0

  1. देखिए 1908 में लार्ड मिंटो के सुधार संबंधी प्रस्तावों पर प्रमुख अधिवक्ता सर भाष्यम आयंगर द्वारा दी

गई महत्त्वपूर्ण टिप्पणी।

  1. ऊपर दी गई तालिका एन.सी. केलकर के ‘‘द केस फॉर इंडियन होम रूल’’ पृष्ठ 81 इस तथ्य को

उजागर करती है।