परिवर्तन की आवश्यकता
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भारतीय संसदीय शासन प्रणाली खोखली थी इसका कारण इस तथ्य से प्रकट होता है कि संसदीय कार्यपालिका के बिना यह संसदीय प्रणाली थी। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इस प्रणाली के अधीन कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थी तथा उसके द्वारा उसे हटाया भी नहीं जा सकता था। भारतीय विधान-मंडल न तो भारतीय कार्यपालिका को बना सकता था और न उसे बिगाड़ सकता था। भारतीय कार्यपालिका विधायिका द्वारा बर्खास्त किए जाने के डर के बिना शांति अथवा युद्ध कर सकती थी। वह अपनी इच्छानुसार कर लगा सकती थी और अपनी इच्छा के अनुसार ही व्यय भी करती थी। इस कार्य में कार्यपालिका विधायिका की इच्छा की तनिक भी चिंता न करके थोड़ी-सी अनुकम्पा दिखाए बिना ही मनमाने ढंग से ऐसा करती थी। वह अपनी इच्छा से कार्य करती थी और अपनी इच्छा से ही काम करने में इंकार कर देती थी तथा उसे विधायिका के बहुमत द्वारा भर्त्सना का भी कोई भय न था। भारतीय संसदीय प्रणाली की सरकार का दृष्टिकोण 1782 से 1800 में विद्यमान आयरिश संसद की स्थिति के निकट लगता है। इस मामले की विशेषता इस तथ्य में निहित थी कि आमतौर पर कहीं जाने वाली ग्रेटन्स पार्लियामेंट अर्थात् आयरिश पार्लियामेंट जिस अवधि में काम करती रही, वह प्रभुसत्ता सम्पन्न विधायिका ही स्वीकार की गई। उस समय आयरिश कार्यपालिका आयरिश संसद के समान संसदीय कार्यपालिका नहीं थी। आयरिश कार्यपालिका को आयरिश विधायिका द्वारा नियुक्त करने और बर्खास्त करने की अपेक्षा ब्रिटिश मंत्रि परिषद् के परामर्श पर वस्तुतः सम्राट नियुक्त और बर्खास्त करते थे। इसी प्रकार भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) की सलाह से सम्राट भारतीय कार्यपालिका की नियुक्ति और बर्खास्तगी करते थे तथा वह किसी प्रकार भी भारतीय विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
यह कहना ठीक है कि भारत में कार्यपालिका भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) के प्रति अंततोगत्वा उत्तरदायी होती थी और उन्हीं के माध्यम से ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी होती थी। श्री फिशर ने कहा है कि यह नहीं भूलना चाहिए कि ख्1, ःµ
‘‘भारत के मामले भारत सरकार के अधीन हैंµ भारत सरकार के प्रस्ताव
लंदन आ सकते हैं और साम्राज्यवादी सरकार द्वारा उनको वीटो द्वारा रद्द
किया जा सकता है। भारतीय नीति की बड़ी रूपरेखा इंडियन ऑफिस
में (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) द्वारा निर्मित की जा सकती है और सशक्त भारत
- फिशर, एच.ए.एल. द्वारा शाही प्रशासन पर अपनी पुस्तक दी एम्पायर एंड दी फयूचर, 1916 पृ. 58 से उद्धृत।