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254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) भारतीय मामलों की दिशा में अपनना अधिक

प्रभाव महसूस करा सकता है, यदि भारत सरकार गंभीरता से उसका विरोध न

करे। परंतु वास्तव में अंतिम निर्णय भारतीय अधिकारियों की सम्मति पर निर्भर

करता है (अर्थात् भारत की कार्यपालिका पर निर्भर करता है) कि भारतीय

नौकरशाही के संयुक्त विरोध के मुकाबले में किसी भी कानून को आरोपित

नहीं किया जाएगा।’’

वास्तव में भारतीय मामलों में सभी प्रकार से सशक्त सेक्रेटरी न तो भारत में कार्यपालिका को नियंत्रित करने का इच्छुक होता है चाहे जनता कार्यपालिका के कार्य को दुष्कर्म ही क्यों न माना जाए और न ही प्रजा के हित में किए जाने वाले कार्य को रोका जा सकता था। ख्1, यह बात कठिनाई से ही कही जा सकती है कि ब्रिटिश संसद में प्रत्येक सदस्य को भारत का सदस्य माना जाता है, उसी ब्रिटिश ने भारतीय कार्यपालिका के कार्यों की चिंताजनक जांच पड़ताल की है। ख्2, दूसरी ओर, भारतीय

  1. ऐसे केवल दो मामले हैं जिनमें भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) ने कार्यपालिका की इच्छा के विरुद्ध

अपने निर्णय दिए। इनका संबंध 1875 के पंजाब ड्रेनेज एक्ट एंड कैनाल एक्ट तथा इंडियन एक्ट से है।

बाद का एक्ट भारत के हितों के लिए स्पष्टतया हानिकारक था।

  1. भारत सचिव (द सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) का वेतन भारत के राजस्व से दिया जाता है। संसद

ने किसी भी अवसर पर संसदीय सत्र की पूरी कार्यवाही में उसके कार्यों की वार्षिक समीक्षा नहीं की

जैसा कि उपनिवेक्षक सेक्रेटरी के मामले में समीक्षा की जाती थी। अंत में सामान्य रूप से विनियोग

विधेयक के दूसरे वाचन के बाद भारतीय बजट को संसद में प्रस्तुत किया जाता था और इससे पूर्व कुछ

अनियमित बहस की जाती थी और इसके बाद संसद एक प्रस्ताव पारित करती थी और औपचारिक

शर्तों में यह दावा किया जाता था कि भारतीय लेखाओं में आय और व्यय के कुछ जोड़ दिखाए जाते

हैं। इस बात के कई प्रयत्न किए गए कि भारतीय मामलों पर संसद का अधिक नियंत्रण हो परन्तु संसद

ने अपने नियंत्रण बढ़ाने की कभी चिंता नहीं की। 1873 में श्री आर.एन. फाउलर ने यह प्रस्ताव रखा

कि सदन की राय में यह वांछनीय है कि भारत के वित्तीय मामलों के प्रस्तावों को सत्रों की अवधि

में तब प्रस्तुत करना चाहिए जब उन प्रस्तावों पर पूर्णतया विचार विमर्श किया जा सके।’’ उसके बाद

1883 में इसी प्रकार का प्रस्ताव श्री फाउलर ने प्रस्तुत किया। भारतीय मामलों की समीक्ष हेतु दोनों

प्रयत्न असफल रहे। 1899 में इसी प्रकार का प्रस्ताव श्री क्लेडवेल, सांसद द्वारा प्रस्तुत किया गया और

इस प्रस्ताव में यह जोड़ा गया कि भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) के वेतन को ब्रिटिश

अनुमानों में शामिल किया जाना चाहिए। श्री फाउलर ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और वह उस समय

भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया) थे तथा इसके फलस्वरूप वह प्रस्ताव रद्द हो गया।

भारत सरकार अधिनियम, 1919 (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1919) के उपबंध के अनुसार सदन को

यह अवसर प्राप्त था कि वह भारतीय मामलों की अधिक समीक्षा कर सकता है, क्योंकि भारत सचिव

(सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) के वेतन को ब्रिटिश अनुमानों में शामिल किया गया था।