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परिवर्तन की आवश्यकता

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मामलों में उसका हस्तक्षेप निश्चय ही भारतीयों के हितों के लिए हानिकारक रहा है। ख्1,

वास्तव में इसमें कोई संदेह नहीं कि सम्राट द्वारा देश की सरकार अपने हाथ में लेने के बाद भारतीय मामलों के संबंध में संसद में उनकी रुचि घटती रही जबकि उसकी तुलना में भारतीय मामलों में संसद की रुचि उस समय कहीं अधिक थी जब देश के मामले कम्पनी के अधिकार में थे। ख्2, इतना ही नहीं भारतीय मामलों पर ब्रिटिश संसद का प्रभाव निश्चित ही अधिक बुरा हो गया। ख्3, क्योंकि इसका समस्त प्रभाव भारतीय कार्यपालिका को लोकमत के समक्ष अवरोध उत्पन्न करने के अलावा लोकप्रिय संघर्ष के विरुद्ध उजागर हो उठा।

इसलिए यह स्पष्ट है कि भारत सचिव (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) तथा संसद का भारतीय कार्यपालिका पर केवल नाम मात्र का नियंत्रण था तथा भारतीय कार्यपालिका वास्तव में उस नौकरशाही के अनियंत्रित निकाय के अधीन थी जो भारतीय मामलों के एकाकी प्रभारी थे। यह विश्वास अनुत्तरदायी कार्यपालिका द्वारा कैसे निभाया जा सका?

इस प्रश्न का सारांश में यह उत्तर दिया जा सकता है कि भारतीय कार्यपालिका ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रगति का बलिदान किया। चाहे हम उसके कार्यों की जांच विधायिका या वित्त के क्षेत्र में करें तो इस वक्तव्य की सत्यता दुखद रूप से स्पष्ट है।

विश्व में ऐसे बहुत कम देश हैं जहां सामाजिक कुरीतियां इतनी अधिक हों जितनी भारत में व्याप्त हैं। कानून एक ऐसा साधन है जिसकी सहायता से समाज समय-समय पर उन बुराइयों को दूर करता है ताकि समाज में संरक्षण बना रहे। परन्तु कुछ अपवादों ख्4, (पृष्ठ 258 देखें) के साथ सबसे हानिकारक वैयक्तिक कानून का नियम है वो नागरिकों के सामाजिक संबंधों को प्रशासित करने के लिए अनुगत रहा, चाहे ऐसी घटना कोई भी क्यों न हो जिसने लोकमत को जागृत किया हो, और उसके विरुद्ध विरोध की आवाज उठाई हो। ख्5, (पृष्ठ 258 देखें)

  1. देखिए 1877 और 1879 में हाउस ऑफ कामन्स के संकल्प जिसमें लंकाशायर के हित में भारतीय कर

निर्धारण नीति की भर्त्सना की गई है।

  1. इसके समर्थन में यह तथ्य बताना चाहिए कि संसद में ईस्ट इंडिया कंपनी के मामलों में कठोर जांच

पड़ताल किए बिना शक्ति नहीं सौंपी।

  1. उस संसद की तुलना की जाए जिसने भारतीय न्यायापालिका के अधीन रखा तथा यह तुलना उस संसद

से की जाए जिसने कार्यपालिका को न्यायपालिका तथा विधायिका के नियंत्रण में रखा है। उस संसद से

तुलना की जाए जिसने भारत में यूरोपियनों पर कठोर विनियम लागू किए तथा उस संसद से की जाए

जिसने उन्हें मुक्त प्रवेश की ही अनुमति नहीं दी अपितु उन्हें मजिस्ट्रेट के नियंत्रण से ही बाहर रखा।

उस संसद की तुलना की जाए जिसने हेस्टिंग्स की भर्त्सना की तथा यह तुलना उस संसद से की जाए

जिसने जनरल डायर का समर्थन किया।