परिवर्तन की आवश्यकता
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से मुक्त किया जाए। इस बात पर जोर दिया गया कि राजस्व प्रणाली को इस प्रकार परिवर्तित कर दिया जाए कि गरीब जनता को राहत मिले। अप्रत्यक्ष करने को न्यायसंगत ठहराया जाता है क्योंकि उस तरीके से गरीब जनता देश के लिए अपना कर भार चुका देती है और इसका उसे आभास भी नहीं होता। परन्तु ऐसे सीमित विषय भी हैं जो कतिपय प्रकार के अप्रत्यक्ष करों के लगाने पर रोक लगाते हैं। पर कहा जा सकता है कि इस बात पर लोक वित्त के विद्यार्थियों को सहमत होना चाहिए कि अप्रत्यक्ष कर ऐसे होने चाहिए कि गरीब जनता पर तुलनात्मक रूप से उनके अपने साधनों के अनुकूल ऐसे करों का भार पड़े। यदि ऐसे अप्रत्यक्ष कर सुविधा की वस्तुओं पर लगाए जाते हैं तो उनके लिए यह संभव है कि इन करों के ऐसे भार को उनके हिस्से में डालना चाहिए जिनकी उन्हें आवश्यकता है और वे अपनी क्रय शक्ति द्वारा इनका समायोजन कर सकते हैं। परन्तु ऐसे मामले भी हैं जहां वे जीवन की आवश्यकताओं पर निर्भर करते हैं तो ऐसी स्थिति में वह लचीलापन संभव नहीं है। भारत में नमक कर के हानिकारक स्वरूप व भारत की राजस्व पद्धति से उसकी विमुक्ति के पर्याप्त आधार के कारण जोर दिया गया। परन्तु कार्यपालिका ने इस मांग को स्वीकार करने से इंकार ही नहीं किया अपितु नमक कर में वृद्धि भी कर दी। जब कभी नमक की कमी हुई और राजस्व के किसी अन्य स्रोत को नहीं खोजा गया जैसा कि सरलता तथा अधिक न्यायप्रिय ढंग से राजस्व का नया स्रोत खोजा जा सकता था। नमक कर लगा दिया गया। 1886 का एक उदाहरण दिया जा सकता है जिसमें यह स्वीकार किया गया था कि ख्1, ःµ
‘‘अंततोगत्वा यह कहा जाता है और किया जाता है और इसमें कोई संदेह नहीं
है कि एक बड़ा तथ्य स्थापित किया जाना है और एक बड़ा कलंक रह जाता
है जो हाल के वर्षों की घटनाओं के दौरान न तो धुल सका अपितु अधिक हो
गया... यह स्थिति ऐसी ही है.... भारत में ऐसे वर्ग के लोग हैं जिन्हें ब्रिटिश
सरकार से सबसे अधिक सुरक्षा और लाभ मिलता है जबकि वे ब्रिटिश सरकार
को बहुत कम योगदान करते है।’’
परन्तु 1887-8 के बजट में कार्यपालिका अपनी धारणा से अलग रही और घाटे को पूरा करने के लिए नमक कर बढ़ा दिया गया। हर घाटा आंतरिक सुधार के असाधारण कानून के कारण नहीं हुआ था अपितु विदेशी हमले के दबाव के कारण हुआ था अर्थात् बर्मा पर विजय। इसी तरह 1886 में आयकर में बंगाल के जमींदारों, असम के चाय उत्पादकों, अवध के ताल्लुकेदारों तथा धनी वर्ग के लोगों की आय को ज्यों का त्यों बनाए रखने की दृष्टि से परिवर्तन नहीं किया गया तथा इन लोगों को औसत दरों पर ही कर लगाया गया और उनसे इसी प्रकार पूर्ववत् आयकर वसूल किया गया।
- देखिए 4 जनवरी, 1886 का सुप्रीम लेजिस्लेटिव काउंसिल में लायसेंस टैक्स अमेंडमेंट बिल पर सर
ए. काल्विन का भाषण।