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262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ भौतिक प्रगति हुई। परन्तु विश्व के लोग शांति और व्यवस्था से अधिक समय तक संतुष्ट नहीं हो सकते क्योंकि वे गूंगे, बहरे, क्रूर व्यक्ति नहीं होते। यह कल्पना करना मूर्खता है कि लोग निश्चय ही नौकरशाही का समर्थन इसलिए करेंगे क्योंकि उन्होंने लोगों के लिए सड़कों का सुधार किया है, अधिक वैज्ञानिक नियमों के अनुसार नहरें बनाई हैं, रेल द्वारा उनकी परिवहन व्यवस्था में सुधार किया है, या डाक द्वारा उनके पत्र भिजवाए जाते हैं। उनके संदेशों को बिजली के समान भेजा जाता है, उनकी मुद्रा में सुधार किया है, उनके माप तोल को नियमित किया है, उनके भौगोलिक, खगोलीय और चिकित्सीय विचारों को शुद्ध किया है तथा उनके आंतरिक झगड़ों को रोक दिया है। परन्तु कोई भी व्यक्ति कितना ही धीर क्यों न हो वह शीघ्र या देर से ऐसी सरकार की मांग करेगा जो दक्षता की मात्र मशीन से कहीं आगे हो। प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार के पश्चिमी विचारों से प्रभावित होकर भारतीय लोग कुछ समय से सरकार के परिवर्तन की मांग कर रहे हैं। संसदीय कार्यपालिका के साथ संसदीय शासन प्रणाली की सरकार बनाने का उनका लक्ष्य है जो वे कुछ समय से व्यक्त कर रहे हैं।

इस लक्ष्य की प्रगति के लिए लोकप्रिय विद्रोह ने ऐसे प्रस्ताव बनाए हैं जो समय के अंतराल में भारत में कार्यपालिका के विचार के लिए गंभीर मामले होंगे। देश की सरकार को किस तरह चलाया जाए? क्या यह सरकार बल प्रयोग द्वारा चलाई जाए अथवा सहमति के अनुसरण से चलाई जाए। फिर भी शासन सत्ता कभी भी अपने आप आत्महत्या नहीं करती। इसकी अपेक्षा जब वह लोगों की इच्छा को पूरा करने में असफल होती है तो वह बल का प्रयोग कर उठती है। यही वह संसाधन है जिसे भारत में कार्यपालिका ने स्वीकार किया या अपनाया। कार्यपालिका अपनी राज-सत्ता की सहायता से संतुष्ट नहीं होती जबकि कार्यपालिका को आपराधिक और दंड संहिताओं के उपबंधों द्वारा शक्तियां उपलब्ध होती हैं ताकि निषेधात्मक कार्यों, अपराधों का पूर्वानुमान किया जा सके। इसने भारतीय कानून की पुस्तक में दमनकारी कानूनों से स्थिति को कलंकित कर दिया है जैसा कि विश्व के किसी भी भाग में ऐसी स्थिति नहीं है। 1908 के क्रिमनल ला एमेंडमेंट एक्ट (आपराधिक कानून अधि नियम 14) ने सरकार की विशेष अनुमति से मजिस्ट्रेट को उस बात की शक्ति दी कि वह अभियोगी अथवा उसके वैध प्रतिनिधि की उपस्थिति के बिना एकपक्षीय जांच कर सकता है और जूरी न्यायाधीश के बिना उस पर मुकद्दमा चला सकता है। इसी एक्ट के अन्य उपबंध के अधीन कार्यपालिका किसी भी संघ को अवैध घोषित