परिवर्तन की आवश्यकता
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कर सकती है जो उसकी समय से कानून और व्यवस्था के रख-रखाव में हस्तक्षेप करता है। स्टेट प्रिजनर्स रेगूलेशन्स ख्1, और एक्टस ख्2, ने कार्यपालिका को यह प्राधिकार दिया कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को नजरबंद कर सकती है जिसके बारे में उसे संदेह हुआ है परन्तु जिसके विरुद्ध उसके पास कोई प्रमाण नहीं है, वह हैबियस कार्पस एक्ट (बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम) ख्3, का स्थाई स्थगन कर सकता है जब कि किसी अधिनियम ख्4, के अधीन कार्यपालिका को ‘‘सैनिक शासन की स्थिति’’ अथवा किसी क्षेत्र में सैनिक शासन की घोषणा करने के लिए शक्ति प्रदान की गई और इसी के अधीन सभी सिविल कोर्ट के कार्य क्षेत्र को सैन्य कोर्ट के पक्ष में निलंबित कर दिया। 1910 के इंडियन प्रेस एक्ट ने प्रस पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया। इसके उपबंध इतने व्यापक थे कि ‘‘भारतीय उच्च न्यायालयों में से एक उच्च न्यायालय के विद्व ान जज ख्5, के मत में यह कठिन था कि मेधावी व्यक्ति द्वारा किसी सीमा तक इसके युक्तिसंगत कार्यान्वयन का विस्तार किया जाए और निश्चय ही उनका कार्यान्वयन ऐसे लेखों पर किया जाएगा जिनको अनुमति की आवश्यकता है’’ तथा ‘‘उसे मानक साहित्य समझा जाएगा जिसे निस्संदेह देखा जाए।’’ सार्वजनिक बैठक आयोजित करने का अधिकार उसी नतीजे से और उसी कठोरता से दबा दिया गया जैसा कि स्वतंत्रता के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संबंध में था और यह स्थिति देश ख्1, के साधारण कानून में दिए गए प्रतिबंधात्मक उपबंधों से ऊपर और अधिक थी। कार्यपालिका ने विशेष कानून के अंतर्गत विवेकाधीन शक्तियों से अपने को सशक्त कर लिया ताकि किसी भी सार्वजनिक बैठक को इस बहाने से रोका जाए कि यह बैठक जनता के हित में नहीं है।
1818 का बंगाल रेग्यूलेशन 3, 1827 का बाम्बे रेग्यूलेशन, 25, 1819 का मद्रास रेग्यूलेशन 2
1850 का एक्ट 24 और 1858 का एक्ट 3
एन. घोष, कम्पेरेटिव एडमिनिस्ट्रेशन ला, 1918, पृ. 480
1857 का एक्ट 9
सर लारेंस जेन्किन्स, सी.जे. इन रे महोम द आली, इंडियन ला रिपोर्टर (आई.एल.आर. 40, कलकत्ता
466 (1913) एन. घोष द्वारा उद्धृत, पृ. 567