परिवर्तन की आवश्यकता
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संसाधन विहीन होते हैं, यदि समझौता करने में असफल हैं तो बल शेष रह जाता
है परंतु बल को सफलता मिले तो भविष्य में समझौता करने की कोई भी आशा
नहीं रह जाती। शक्ति और प्राधिकार कभी-कभी दयालुभाव से उपलब्ध होते हैं
परन्तु उन्हें दरिद्रता और असफल हिंसा द्वारा भीख मांग कर प्राप्त नहीं किया जा
सकता। बल के लिए एक अन्य आपत्ति है कि आप किसी वस्तु को सुरक्षित
रखने के लिए किसी न किसी प्रकार मरम्मत कर सकते हैं। आपने जिस बात
के लिए लड़ाई की (लोगों की स्वामिभक्ति प्राप्त की जाए) वह ऐसी बात नहीं
है जो आप प्राप्त करते हैं परन्तु आप संघर्ष में उसका मूल्यापकर्ष, मरणासन्न
स्थिति, बर्बादी और खपत कर लेते हैं।’’
अनुमति द्वारा सरकार बहुत समय पूर्व राजनैतिक बुद्धिमत्ता के सिद्धांत के रूप में भारतीय कार्यपालिका द्वारा वस्तुतः स्वीकार कर ली गई थी और भारतीय विधान-मंडल के संविधान में समय-समय पर किए गए परिवर्तन स्पष्टतया इस प्रयोजन के लिए बनाए गए जो जन इच्छा को व्यक्त करते थे। कुछ समय के लिए यह परिणाम निकला जिसके अनुसार भारतीय कार्यपालिका और भारतीय विधायिका के मध्य आश्चर्यजनक समझौता बना रहा इतना ही नहीं राजादेश और वेस्टील को भारतीय विधान-मंडल का बहुमत प्राप्त था। परन्तु इस सभी के होते हुए भी अनुमति अथवा समझौते द्वारा यह सरकार क्षमावरण थी। दूसरी ओर भारतीय विधान-मंडल के संविधान में समय-समय पर किए गए परिवर्तनों के विश्लेषण से स्पष्ट रूप से यह विदित होता है कि इन परिवर्तनों का उद्देश्य यह था कि विधान मंडल को निष्क्रीय अथवा कार्यपालिका के हाथों में कठपुतली संस्था बनाना था। कार्यपालिका से नितांत अलग ख्1, प्रथम बार विधान-मंडल का 1853 ख्2, में उद्घाटन हुआ। परन्तु विधान-मंडल के संविधान में 1861 ख्3, में परिवर्तन कर दिया गया। इसके आधार पर जोर दिया गया कि विधान-मंडल भारतीय लोगों के प्रतिनिधियों की निकाय नहीं है। ख्4, अनेक प्रांतीय सरकारों के प्रतिनिधि सरकारी वर्ग से इसके बनाए गए। विधान-मंडल को लोगों का प्रतिनिधि बनाने के लिए 1861 के अधिनियम में यह निर्देश दिया गया कि इसके गठन में उन सदस्यों को सम्मिलित किया जाए जो जनता में से कार्यपालिका की
- 1833 तक कार्यपालिका ही विधायिका थी। 1833 में कार्यकारी परिषद् में एक विधि सदस्य सम्मिलित
किया गया। जिसका कार्य परिषद् को विधि निर्माण में सहायता देना था। 1853 के अधिनियम द्वारा उसे
कार्यकारी परिषद् में समाहित कर लिया गया।
विक्टोरिया 16 एवं 17, सी 95
विक्टोरिया 24 और 25, सी 67
1853 के अधिनियम द्वारा भारत सरकार की कार्यकारी परिषद् के सदस्यों के अलावा बंगाल के उच्च
न्यायालय के दो न्यायाधीशों तथा बंगाल, मद्रास, मंबई और उत्तर पश्चिमी प्रांतों की सरकारों के नामांकित
सदस्यों द्वारा सर्वोच्च विधान-मंडल का गठन किया गया।