266 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सलाह से गवर्नर जनरल द्वारा नाम निर्देशित किए गए सदस्य हों। 1892 के अधिनियम द्वारा गवर्नर जनरल को निर्देश दिया गया कि विधान-मंडल में से ऐसे व्यक्तियों को नामांकित किया जाए जो देश में लोक निकायों द्वारा चुने गए थे। विधान-मंडल के संविधान में इन परिवर्तनों का उद्देश्य विधान-मंडल को उदार बनाना था। परन्तु क्या यह प्रवृत्ति विधान-मंडल के प्रतिनिधि को ऐसा बनाना था कि उसमें ऐसी प्रवृत्ति हो जाए कि वह कार्यपालिका के मुकाबले अधिक शक्तिशाली हो? इस प्रवृत्ति का विपरीत प्रभाव रहा। विधानमंडल ने अपने प्रतिनिधित्व चरित्र को अपनाया परन्तु उसने नियंत्रण की शक्ति को खो दिया। 1853 के अधिनियम के अधीन विधान-मंडल द्वारा कार्य में लाई गई शक्तियां 1861 के अधिनियम के अधीन विधान-मंडल द्वारा अपनाई गई शक्तियों से कहीं अधिक थीं। पूर्व अधिनियम के अधीन भारतीय विधान-मंडल को इंग्लैंड के हाउस ऑफ कामन्स की प्रक्रिया के अनुसार ऐसा रूप दिया गया कि यह विधान-मंडल शुद्ध तथा सरल ढंग से विधायिका के मामलों को ही नहीं देखता था अपितु प्रशासन के मामलों को भी देखता था। सर सी. इलबर्ट के शब्दों में यह व्यक्त किया गया है कि इसने कार्यपालिका सरकार के कानूनों के औचित्य पर प्रश्न करने तथा उनके बारे में विचार-विमर्श द्वारा कुछ असुविधाजनक स्वतंत्रता दिखाई µ स्वयं को दुर्व्यवहार तथा शिकायतों के बारे में सतर्कता करने के लिए सक्षम बताया तथा इसके स्थानीय प्रशासनों से रिपोर्ट और विवरण पत्र मंगाए और कार्यपालिका सरकार से स्वतंत्र रूप में संकल्प तथा प्रस्ताव प्रस्तुत किए और लोकहित के मामलों पर लंबी बहस की। उस समय लार्ड केनिंग ने अपने ज्ञापन में यह बताया कि विधान-मंडल हाउस ऑफ कामन्स के समान अति निकट से प्रक्रिया के स्वरूप और विधि में निहित है, तथापि परिषद् में एकत्र एक दर्जन महानुभावों की प्रक्रिया को नियमित करने के लिए 136 स्थाई आदेश थे, संक्षेप में सर लारेंस पील के शब्दों में व्यक्त किया गया कि विधान-मंडल ने देश की जांच पड़ताल की प्रकृति के अनुसार अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। 1853 के अधिनियम द्वारा निर्मित विधान-मंडल में यह गंभीर दोष समझा गया। इसलिए इसके सुधार के लिए और कार्यपालिका की सर्वोच्चता को बनाए रखने के लिए अधिक आवश्यक समझा गया तथा इसकी अलोकप्रिय प्रवृत्ति को इसके पुनर्निर्माण के लिए तथाकथित बहाना माना गया। 1861 में प्रारंभ किए गए छद्म प्रतिनिधि पद्धति के अंतर्गत विधान-मंडल कार्यपालिका के हाथों में नितांत विनम्र निकाय रही। यह नामांकित सदस्यों द्वारा गठित की गई थी अतः विधान-मंडल में डिवीजन उस तथ्य से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित था। प्रत्येक विधायी निकाय में एक व्यक्ति को भाग लेना चाहिए जब तक उसे वंशानुगत अधिकार प्राप्त न हो जिसे आधुनिक बोलचाल में अधिदेश कहा जाता है। वह अधिदेश प्रायः उस प्राधिकार से आगे बढ़ता है जिसके प्रति वह