परिवर्तन की आवश्यकता
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अपनी सीट के लिए आभारी होता है। सरकारी और गैर-सरकारी नामांकित सदस्यों ने कार्यपालिका की सद्भावना से विधान-मंडल में अपना स्थान प्राप्त किया और इस प्रकार विधान-मंडल को उन कानूनों के बारे में कार्यपालिका को सहायता देनी थी जिसके बारे में मत विभाजन हुआ हो। कार्यपालिका सदैव उन नामांकित सदस्यों के सरकारी समूह (ब्लाक) पर अपना नियंत्रण रखती थी जो कार्यपालिका के अधि देशों के प्रति स्पष्ट रूप से आज्ञाकारी रहे क्योंकि कार्यपालिका की दृढ़ धारणाएं थीं अथवा उसी के एक भाग होने के नाते ऐसा था। ऐसे नामांकित गैर-सरकारी सदस्य स्वतंत्र सदस्य नहीं थे जो कार्यपालिका की दृढ़ धारणा के विपरीत हों और अधिकांशतया वे कार्यपालिका के अनुकूल रहते थे। बजाए इसके उन्हें कार्यपालिका के सदस्यों के समान समझा जाए। परन्तु यदि वे स्वतंत्र प्रकार के लोग होते फिर भी वे कार्यपालिका के सदस्यों को अपने अधीन नहीं कर पाए क्योंकि संवैधानिक कानून के उपबंध तथा उसके अधीन निर्मित प्रक्रिया के नियमों में वांछित प्रावधान नहीं था। अतः विधान-मंडल नितांत रूप से इतना शक्तिहीन हो गया था कि वह कार्यपालिका को अपनी इच्छाओं के विपरीत दबाव डाल सके। 1853 से 1861 तक विधान-मंडल ने विधायी तथा प्रशासकीय मामलों का निपटान किया। 1861 से विधान-मंडल केवल विधायी प्रयोजनों के लिए कार्य करता रहा। उस सीमा के फलस्वरूप विधान-मंडल प्रश्न पूछने, प्रस्ताव प्रस्तुत करने अथवा बजट पर मत विभाजन के लिए आग्रह करने से वंचित रह गया। विधान-मंडल अपने जीवन के प्रथम तीस वर्ष में सोलह अवसरों से अधिक पर अपने वार्षिक बजट पर भी बहस नहीं कर सका और इन अवसरों पर इसलिए बहस कर पाया क्योंकि कुछ नवीन कर विधान के लिए आवश्यक कार्य था तथा वह कार्य नामांकित सरकारी ब्लाक की सहायता से सदैव कार्यपालिका निभाती रही क्योंकि कार्यपालिका ने प्रत्येक प्रकार का विधान किया जिसे वह आवश्यक समझती थी। 1892 के भारतीय परिषद् अधिनियम (इंडियन काउंसिल एक्ट) के अधीन बनाए गए प्रक्रिया के नियमों द्वारा सर्वप्रथम विधान-मंडल वार्षिक वित्तीय वक्तव्य पर बहस करने का अधिकार तथा विभिन्न विषयों पर प्रश्न करने का अधिकार प्राप्त कर सका। परन्तु इसमें संदेह किया जा सकता है कि क्या विधान-मंडल को शक्तियों की रियायतें उस स्थिति को पुनः बनाए रखने के लिए थीं जो उसके अधिकार क्षेत्र में थीं तथा ऐसा आधि पत्य 1853 के अधिनियम के अंतर्गत कार्यान्वित किया गया था।
यहां तक कि लार्ड मार्ले के सुधार भी कार्यपालिका पर विधान-मंडल की स्वतंत्रता तथा शक्ति के वास्तविक कानून के मामले में कम रहे। उन्होंने प्रत्यक्ष अथवा चयन के अनुसार 1909 में नामांकन में सुधार किए, उन सुधारों में विधान-मंडल के संविधान के आधार के रूप में सैद्धांतिक रूप से चुनाव को स्थान दिया गया।