268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसके साथ ही विधान-मंडल की प्रक्रिया को उदार किया गया ताकि सदस्यों को प्रश्नों के साथ पूरक प्रश्न पूछने, वित्तीय वक्तव्य और सामान्य लोक हित के मामलों में प्रस्ताव प्रस्तुत करने की शक्ति प्रदान की जाए। परन्तु थोड़ा-सा विश्लेषण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि कार्यपालिका की सर्वोच्चता को हानि पहुंचाए बिना विधान-मंडल के उदारीकरण का पुराना प्रयास एक आंशिक प्रयास था। ख्1, कार्यपालिका की यह सर्वोच्चता विधान-मंडल में नामांकित सरकारी कर्मचारियों का स्थाई बहुमत तथा प्रक्रिया के नियमों के नियंत्रण द्वारा बरकरार रखी गई। यद्यपि विधान-मंडल के गठन के आधार के रूप में 1892 के अधिनियम द्वारा चुनाव स्वीकार किया गया था। ख्2, चुने गए सदस्य अल्पमत में थे ताकि वे उन लोगों की इच्छाओं को प्रभावकारी नहीं बना पाएं जिन्होंने उन्हें चुना था। उन्हें प्रस्ताव प्रस्तुत करने का अधिकार था यदि कार्यपालिका उन्हें अनुमति देती। ख्3, परन्तु कार्यपालिका उन्हें निभाने के लिए बाध्य नहीं थी। वे सिफारिशें मानी जाती थीं और वे कार्यपालिका पर बाध्य नहीं थीं। इस सीधे अवरोध से कार्यपालिका और विधान-मंडल के निर्वाचित सदस्यों के बीच मन-मुटाव पैदा हो गया। निश्चित रूप से यह 1909 के सुधार कार्य की दृष्टि से ठीक नहीं थे। 1909 के पूर्व जो कुछ भी संघर्ष था, वह विधान-मंडल के बाहर प्रकट होता था। चुनाव और प्रक्रिया के नियमों द्वारा विधान-मंडल पूर्ण रूप से हतोत्साह हो गया था। वह कोई शरारत नहीं कर सकता था। फिर भी 1909 के सुधारों द्वारा इस बात का प्रयास किया गया कि विधान-मंडल को स्वतंत्र बनाया जाए और इसके साथ ही उसे हतोत्साह भी किया जाए। यह प्रयास कितना ही उत्तम क्यों न हो, इससे कार्यपालिका और लोगों के मस्तिष्कों में उत्तेजित करने वाली शक्तियों के बीच अति गहन संघर्ष को उभारने में सहायता मिली। चुनाव प्रक्रिया या विधान-मंडल को शासित करने वाली
- आयरिश होम रूल के समर्थन द्वारा उदारीकरण के नेता के रूप में विश्वविख्यात लार्ड मार्ले ही थे जिन्होंने
भारत में राजनीतिक सुधारों को प्रारंभ करते हुए कहा था ‘‘यदि मुझे यह पता होता कि मेरे दिन या तो
सरकारी अथवा शारीरिक रूप से बीस गुना होते जैसी कि संभावना की जाती है तो मैं भारत में संसदीय
पद्धति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए खेद प्रकट करता। भारत में संसदीय पद्धति वह लक्ष्य नहीं है
जिसके लिए मैं एक क्षण भी आकांक्षा करूं।’’
- फिर भी यह चयन की पद्धति थी। 1861 के अधिनियम और 1892 के अधिनियम में केवल यही अंतर
था कि 1861 के एक्ट के अधीन कार्यपालिका सरकार को समुदाय के वर्गों की सलाह पर नामांकित
करना था जैसा कि उस मामले में सहायता करने के सक्षम होने की संभावना है। परन्तु चूंकि सरकार
इस बात पर बाध्य नहीं थी कि चुने गए व्यक्ति को नियुक्त करे फिर भी दूसरा छिपा हुआ ही क्यों न
हो, कार्यपालिका द्वारा वस्तुतः नामांकित समझा जाना चाहिए जैसा कि पहला था। 3. कानून के अनुसार परिषद् के अध्यक्ष अर्थात् वायसराय थे परन्तु उन्हें कार्यकारी परिषद् की सलाह पर
निरपवाद रूप से कार्यशील माना जाता है।