परिवर्तन की आवश्यकता
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क्रियात्मक प्रक्रिया प्रोफेसर रेडलिच के कथनानुसार राजनीतिक दबाव का माप है जो संसदीय तंत्र के तनाव को व्यक्त करती है और इसका प्रभाव पूरे प्रांत पर होता है। ख्1, यह संभव है कि यह दबाव का माप सर्वप्रथम था तो बुरी दशा में निर्मित हुआ है अथवा भंग हो गया है जो वास्तविक तनाव का अशुद्ध पठन प्रस्तुत करता है। परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के मामले में कार्यपालिका ने समय-समय पर और विशेषकर 1909 में विधान-मंडल के चुनाव तथा कार्य प्रक्रिया में परिवर्तन किए, वे उद्देश्य की दृष्टि से अच्छे नहीं थे तथा इस बात का प्रयास किया कि राजनीति की घोर उत्तेजना के फलस्वरूप खतरनाक दबाव को छिपाया जा सके ताकि स्थिति के बारे में अशुद्ध पठन प्रस्तुत किया जाए। जब तक विधान-मंडल के सदस्य कार्यपालिका से अधिदेश प्राप्त करते रहे, जबकि तथ्य यह था कि सभी नामांकित सदस्य थे, तब तक यह युक्ति भलीभांति कार्य करती रही, इसके साथ ही उन निर्वाचित सदस्यों की प्रविष्टि होती रही जो जनता से अधिदेश प्राप्त कर चुके थे अतः इस युक्ति की कमजोरी स्पष्ट हो गई। निर्वाचित सदस्यों की अवमानना ने उन्हें प्रक्रिया का सैद्धांतिक आधार के रूप में मान्यता प्राप्त महान आधारभूत सिद्धांतों में बाधा डालने तथा उन्हें चुनौती देने की ओर उन्मुख किया। अब यदि किसी पार्टी ने कार्यवाहियों के चलाने के नियमों µ वाक् स्वातंत्र्य अथवा लोगों के बहुमत के बारे में सदस्यों में असमानता की शिकायत की तो यह राष्ट्र के जीवन में कुछ गंभीर दोषों के अस्तित्व को प्रदर्शित करने वाला खतरनाक संकेत है। यदि कोई ऐसा संघर्ष उत्पन्न होता है तो किसी राजनेता को यह जानने के लिए है कि क्या उसे प्रतिनिधि विधानसभा की प्रक्रिया में सुधार अथवा देश के संविधान में सुधार करना है।
यदि विधान सभा में उस कठोर विपक्ष और क्रांति के संकेत थे जो अफलित प्रयासों से उत्पन्न होते हैं तो विधान-मंडल के बाहर ऐसी भावना शीघ्र ही उभर रही थी जिससे शिक्षित भारतीयों के मस्तिष्कों मे शीघ्रता से राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक शक्ति की इच्छा हर वक्त बढ़ रही थी, इसमें कोई संदह नहीं क्योंकि अपनी सीमित शक्तियों के साथ विधान-मंडल अपर्याप्त सुरक्षा वाला पाया गया। इस तथ्य के सिद्ध होने के फलस्वरूप उन लोगों ने जिन्होंने देश के राजनीतिक पुनर्निर्माण के विचारों को त्याग दिया था, इस बात पर सहमति प्रकट की कि प्रक्रिया में केवल सुधार करके काम नहीं चलेगा। केवल संविधान में सुधार से देश को अराजकता से बचाया जा सकेगा।
फिर भी भारत के संविधान में परिवर्तन को प्रभावी बनाने के लिए प्रस्तावित सुधारों में काफी विविधता थी। इस परिप्रेक्ष्य में एक योजना पर ध्यान दिया जाए। यह योजना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने प्रतिपादित की थी और
- देखिए जे. रेडलिच, पार्लियामेंट्री प्रोसीज्युर (संसदीय प्रक्रिया), खंड 3, पृ. 198