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270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सारांश में इस योजना को कांग्रेस-लीग योजना कहा जाता है। ख्1, इस योजना के अनुसार केन्द्रीय विधान-मंडल में चुने गए सदस्यों के 4/5 भाग के बहुमत की मांग की गई थी। जहां तक कार्यपालिका का प्रश्न है यह मांग की गई थी कि कार्यपालिका के कुल सदस्यों में से आधे सदस्य भारतीय होने चाहिए और उनका चयन विधान-मंडल के चुने गए सदस्यों द्वारा किया जाना चाहिए। विधान-मंडल को पूर्ण वित्तीय और विधायी शक्तियां उपलब्ध थीं। इतना ही नहीं प्रस्तावों द्वारा पारित इसकी सिफारिशें कार्यपालिका पर बाध्य मानी जाती थीं। इस प्रकार भारत की जनता की ओर से यह प्रमुख भारतीय राजनीतिक संगठनों के दावों की नवीनतम्, सबसे पूर्ण और सबसे प्राधिकृत प्रस्तुति थी। परन्तु जब हम योजना का विश्लेषण करते हैं तो यह भारतीय राजनीतिज्ञों की अकिंचन राजनीतिक प्रतिभा पर प्रकाश डालती है। यह योजना ब्रिटिश भारत (ब्रिटिश इंडिया) में उत्तरदायी सरकार की पूर्ति के लिए निर्मित की गई थी। परन्तु व्यवहार की दृष्टि से यह उत्तरदायी सरकार का साधन ही नहीं थीं अपितु श्रेष्ठ सरकार के उद्देश्यों की अल्प सेवा के लिए भी अपर्याप्त थी। इस योजना ने यह नहीं बताया कि क्या विधान-मंडल की अपनी इच्छानुसार कार्यपालिका के निर्माण अथवा उसे समाप्त करने की शक्ति होगी। यदि इस योजना में यह बात उठाई गई होती तो इस योजना को उत्तरदायी सरकार की योजना माना जा सकता था। परन्तु इस योजना में कार्यपालिका पर दबाव डालने की बात उठाई गई जो विधान-मंडल के आदेशों के अनुसार देश के शासन को चलाने के लिए अस्थानान्तरीय थी। यह योजना लार्ड मार्ले की बृहद् योजना का एक अंश थी। उन्होंने सरकार में भारतीय तत्त्व को प्रारंभ किया ताकि कार्यपालिका के सरकारी विधायिकी अंग के माध्यम से जो कुछ होता है उसके अलावा भारतीय मत और भारतीय परामर्श का कार्यपालिका में प्रभाव बढ़े। जिन लोगों ने कांग्रेस-लीग योजना बनाई थी उन्होंने कार्यपालिका और विधान-मंडल में भारतीय तत्त्व की केवल वृद्धि की और उसमें ऐसे उपबंध शामिल कर दिए जिनका उद्देश्य यह था कि चरितार्थ किए बिना परामर्श को नियंत्रण में परिवर्तन करना था कि उस समय क्या होगा यदि कार्यपालिका ने विधान-मंडल की इच्छाओं से बाधित होने से इंकार कर दिया। इस परियोजना का सारांश एक कार्यपालिका बनाना था जिसमें विभाजित अधिदेश था और वैध रूप से यह संसद के प्रति उत्तरदायी थी और व्यावहारिक रूप से विधान-मंडल के प्रति उत्तरदायी थी। यह स्पष्ट था कि इस प्रकार अधिदेशों के विभाजन से विधानमंडल को इस योग्य बना दिया गया था कि वह कार्यपालिका को हटाने की शक्ति के बिना उसे निष्क्रिय कर सकती थी। मतदाताओं

  1. यह ईस्ट इंडिया कान्स्टीट्यूशनल रिफार्मस (संवैधानिक सुधारों) में है, 1918 का कमांड 1918,

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