ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध - Page 29

14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लिया और राजनीतिक तथा व्यापारिक गतिविधियां साथ-साथ जारी रखीं। इस संयुक्त कार्यवाही के फलस्वरूप भारत में कंपनी का राजस्व संबंधी प्रशासन एक जटिल क्रिया बन गया। व्यापारिक और राजस्व वसूली को परस्पर मिला दिया गया और उनमें भेद करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। वित्त का कोई भी अध्येता, इसलिए, पूरी अवधि को जो 1814 में समाप्त होती है जबकि संसद के एक अधिनियम द्वारा कंपनी को मजबूर किया गया कि वह वित्त और व्यापार का लेखा अलग-अलग रखे अनदेखा कर देगा। इस सावधानी के साथ अब हम राजस्व शीर्षों का अध्ययन करेंगे।

1. भू-राजस्व (मालगुजारी)

भारत के कुछ भागों में आरंभ में औद्योगीकरण के बावजूद संपूर्ण देश को पहले की तरह आज भी कृषि देश के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है तथा इसका अधिकतर राजस्व भूमि से ही प्राप्त होता रहा है।

ब्रिटिश सरकार ने सही अथवा गलत तरीके से भूस्वामी पद्धति बनाम निजी संपत्ति का सिद्धांत स्थापित किया तथा इसी नीति के अनुरूप अपनी भू-राजस्व पद्धति नियमित की।

भारत में भू-राजस्व की विभिन्न पद्धतियां हैं। प्रिवी काउंसिल के विवरणों के अनुसार इसकी व्याख्या करना अधिक उपयुक्त होगा।

I . कार्नवालिस की जमींदारी व्यवस्था

इस पद्धति का अत्यंत महत्त्वपूर्ण लाभ संग्रहण की सुविधा है, क्योंकि सरकार के अधिकारियों द्वारा पूरे विवरण के रखरखाव के साथ राजस्व प्राप्त करने की तुलना में एक बड़े जिले के कुछ निश्चित जमींदारों अथवा अंशदाताओं से राजस्व प्राप्त करना अधिक सरल है। इसका दूसरा लाभ निःसंदेह 1831 के परिणाम की अधिक सुनिश्चित सीमा है (सी. 3339)।

अतः भूमि काश्तकारी की प्रथा इस प्रकार स्थापित हुईµ जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी की राजस्व वसूली का अधिकार हासिल किया तो उन्होंने यह पाया कि मुसलमान शासन के अधीन राजस्व अधिकारियों (सूबेदारों) की मध्यस्थता से भू-राजस्व एकत्रित किया जाता है जिनका जिले की विभिन्न पद्धतियों के आधार पर राजस्व कभी कम व कभी अधिक होता था अथवा जैसे विभिन्न ओहदेदारों तथा जमींदारों और तालुकदारों जो राजस्व को खजाने में एक ही बार जमा करते थे, और इसके लिए वे जिलों का अधिकांशतः प्रबंध करते पाए गए थे और बदले में उनका उत्तरदायित्व सरकार को एक निश्चित धनराशि वार्षिक तौर पर अदा करनी