ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध 15
होती थी। उनमें से बहुतों ने इस शर्त के अधीन अपने जिलों अथवा सम्पत्तियों को पुश्तैनी बना लिया था (2 सी.एफ. 1831 सी. 3114, 3115, 3215)। ईस्ट इंडिया कंपनी का बंगाल पर आधिपत्य होने से राजस्व एकत्र करने वाले विभिन्न प्रकार के कर्मचारियों को बहुत अपमान सहने पड़े। व्यापार का ब्यौरा इतना विस्तृत था कि इससे लार्ड कार्नवालिस तथा तत्कालीन सरकार सहम गई तथा छोटे काश्तकारों तथा छोटे किसानों के संरक्षण के लिए कोई उपाय नहीं ढूंढ़ा गया, सिवाए इसके कि भू-स्वामियों की श्रेणियां बनाई गईं जिनसे अत्यधिक लाभ अपेक्षित था। इसका मुख्यतः आधार यह था कि उन जमींदारों को जिन्हें जमीन से स्थान लगाव था, उनको वह भूमि सौंपी जाए जिससे कि छोटे किसानों की समृद्धि में वे दिलचस्पी लें। जिस प्रकार कि इंग्लैंड के जमींदार अपने काश्तकारों की समृद्धि के बारे में सोचते हैं। इससे दो लाभ सोचे गए। पहला, देश में भूमि की जागीरदारी उत्पन्न हुई तथा इससे भी अधिक छोटे काश्तकारों व किसानों के हितों को जमींदारों की पैतृक भावनाओं से सुरक्षा प्रदान करना संभव हुआ (1 सी.एफ. 1831 सी. 3136)।
संपूर्ण कृषक जनसंख्या की सुरक्षा एवं उत्तम उद्देश्य की दृष्टि से 1793 में जमींदारों को चाहे वे खेतिहार हों या जिले के संबंधित अधिकारी, वंशानुगत हों या विशेष नियुक्ति द्वारा, भू-सम्पत्ति का उन्हें स्वामी लगभग उसी तरह बनाया गया जिस तरह इंग्लैंड में साधारण शुल्क देकर भू-मालिक होते थे। जो राशि जमींदार परंपरागत रूप में दे दिया करते थे उसे गत वर्षों के निरीक्षण से तय कर सदा के लिए कर निश्चित कर लिया गया। एक प्रतिबंध बनाया गया कि भू-राजस्व की यह राशि उस से कभी भी बढ़ाकर वसूल न की जाए। इस प्रकार की जमींदारी अथवा भूमि व्यवस्था स्थायी बंदोबस्ती (परमानेंट सैटिलमेंट) के नाम से जानी जाती हैµ (2, सी. एफ. 1831 सी. 3115, 3116, 3136, 3215, 1832 आर.सी. पृष्ठ 21)।
II . ग्राम मालगुजारी पद्धति
ग्राम समुदाय व्यवस्था मुख्यतया उत्तर भारत में पाई जाती थी और अब भी विद्यमान है। भू-स्वामित्व अधिकार संपूर्ण ग्रामवासी समुदाय को प्राप्त हैं। गांव का प्रशासन ग्रामीण जनता द्वारा चुने गए मुखिया को सौंपा गया है जो उन्हीं के द्वारा हटाया जा सकता है। इस पद्धति के अधीन कभी-कभी भूमि उसी गांव के निवासियों को आध-बटाई पर दे दी जाती है और कभी पड़ोसी ग्रामवासियों को, यद्यपि भूमि का कुछ भाग और उसका कुछ अधिकार गांव के विभिन्न कारीगरों व शिल्पकारों जैसे विद्यालयाध्यापक, धोबी, नाई, बढ़ई, लोहार, चौकीदार, गांव के मुनीम आदि को दिया जाता है और प्रत्येक समुदाय के लोग इससे प्राप्त होने वाले काम का कुछ भाग गांव के स्वीकृत खर्च तथा अतिथि सत्कार के लिए रखते हैं ( 1 सी.एफ. 1830, एल. 398, 399, 405, 406, 529)। ये ग्रामीण समुदाय लघु